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एन. रघुरामन का कॉलम:कम पैसे देना बचत नहीं, बल्कि औसत दर्जे की चीजों में निवेश जैसा है

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कुछ महीने पहले हमने एक हाउस-हेल्प काम पर रखीं, क्योंकि पहले वाली शादी के बाद दूसरे शहर में शिफ्ट हो गईं। नई कर्मचारी मुश्किल हालात में थीं और उन्हें नौकरी की सख्त जरूरत थी। हमने पहले उन्हें जिम्मेदारियां समझाईं और फिर पूछा कि कितनी तनख्वाह लेंगी। उनकी कीमत सुन कर हम हैरान रह गए। हमें समझ आ गया कि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि वह मोलभाव नहीं कर सकतीं। चूंकि हमें पता था कि किसी न किसी से उन्हें पहले वाली कर्मचारी की तनख्वाह पता चल जाएगी, इसलिए हमने कहा कि आपको पिछली कर्मचारी के समान ही सैलरी मिलेगी। यह सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जब से उन्होंने काम शुरू किया, हर मामले में पिछली कर्मचारी से बेहतर और मुस्कराते हुए काम कर रही हैं। अतिरिक्त काम के लिए हमने उन्हें अतिरिक्त पैसे दिए तो वह रो पड़ीं। हममें से ज्यादातर अर्थशास्त्र का बुनियादी सिद्धांत जानते हैं कि कीमत गुणवत्ता को प्रभावित करती है। भरोसेमंद मशीनरी के लिए हम ज्यादा पैसे देने को तैयार रहते हैं, क्योंकि ब्रेकडाउन महंगा पड़ता है। महत्वपूर्ण मामलों में हम अनुभवी वकील नियुक्त करते हैं, क्योंकि गलतियां महंगी पड़ती है। फिर भी कुछ संस्थाएं उम्मीद करती हैं कि उच्च शिक्षित प्रोफेशनल ऐसे वेतन पर असाधारण नतीजे दें, जो उनकी विशेषज्ञता के अनुरूप नहीं है। ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (जीएचएमसी) इसका उदाहरण है, जहां सफाई कर्मचारी की नौकरी का वेतन स्किल्ड आईटी कर्मचारी से अधिक है। जीएचएमसी ने हाल ही में जारी एक टेंडर नोटिफिकेशन में हार्डवेयर इंजीनियर, डेटाबेस एडमिनिस्ट्रेटर्स, सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर्स, नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर्स, प्रोग्रामर्स, टीम लीडर्स, जीआईएस एनालिस्ट्स और वेब डिजाइनर्स जैसे पदों के लिए पेशेवर मांगे। इसने लोगों का ध्यान खींचा, क्योंकि ऑफर किया गया वेतन कम था। जीएचएमसी ने 12 हार्डवेयर इंजीनियरों के लिए 28 हजार रुपए मासिक वेतन प्रस्तावित किया। एमटेक और तीन साल के अनुभव वाले सीनियर जीआईएस एनालिस्ट को 37 हजार रुपए और बीटेक के साथ छह साल के अनुभव वाले वेब डिजाइनर के लिए 42 हजार रुपए मासिक वेतन तय किया गया। इसके विपरीत, नवनियुक्त सफाई कर्मचारी को लगभग 30 से 35 हजार रुपए प्रति माह मिलेंगे। वरिष्ठता बढ़ने के साथ उनका वेतन 70 से 80 हजार रुपए तक पहुंच सकता है। दिलचस्प यह है कि जीएचएमसी अधिकारियों ने इसका कारण बताया कि आईटी क्षेत्र के आउटसोर्स कर्मचारियों का पे-स्केल रिवीजन नहीं हुआ है। इसका पहला नतीजा होता है कि सबसे अच्छे उम्मीदवार आवेदन ही नहीं करते। कुशल पेशेवर अपनी कीमत जानते हैं। यदि उन्होंने शिक्षा, सर्टिफिकेशन और अनुभव हासिल करने में वर्षों खपाए हैं तो स्वाभाविक तौर पर वे अवसरों की तुलना करते हैं। अव्यावहारिक वेतन निराश उम्मीदवारों को, या ऐसे लोगों को आकर्षित करता है, जो बेहतर अवसर नहीं मिलने तक इस नौकरी को अस्थायी ठिकाना मानते हैं। दूसरा नतीजा और नुकसानदायक है। जो लोग नौकरी स्वीकार भी लेते हैं तो पहले दिन से ही असंतुष्ट रहते हैं। हर असाइनमेंट उन्हें याद दिलाता है कि उन्हें कम आंका जा रहा है। ‘मैं कैसे बेहतर योगदान दे सकता हूं?’ के बजाय वे पूछने लगते हैं कि ‘कितनी जल्दी यहां से निकल सकता हूं?’ कोई मोटिवेशनल स्पीच और टीम-बिल्डिंग एक्टिविटी लगातार बने रहने वाले अन्याय के भाव की भरपाई नहीं कर सकती। संस्थान को इसकी छिपी हुई कीमत चुकानी पड़ती है। कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर बढ़ जाती है। प्रोजेक्ट धीमे हो जाते हैं। हर इस्तीफे के साथ नॉलेज बाहर जाती है। भर्ती खर्च बढ़ता है। मैनेजर प्रतिभाओं को निखारने के बजाय नए लोग खोजने में ज्यादा समय लगाते हैं। अंततः ग्राहक भी सर्विस और एग्जीक्यूशन में अस्थिरता को नोटिस कर लेते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हर स्टार्टअप या छोटा बिजनेस बहुराष्ट्रीय कंपनियों जितना वेतन दे। संसाधनों में अंतर होता है। लेकिन निष्पक्षता कभी भी गायब नहीं होनी चाहिए। यदि नकदी सीमित है तो संस्थाएं ग्रोथ के पारदर्शी तरीके, परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव, सीखने के मौके, सार्थक जिम्मेदारियां और सम्मान देकर इसकी भरपाई कर सकती हैं। कर्मचारियों को यदि भविष्य दिखता है तो वे अकसर कम वेतन भी स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन ऐसी स्थिति शायद ही स्वीकार करें, जहां उन्हें कम आंका जाए और ग्रोथ का वादा भी न हो। फंडा यह है कि इंसान जब सम्मानित महसूस करते हैं तो वे दिमाग से योगदान देते हैं। जब अपमानित महसूस करते हैं तो केवल अपना समय देते हैं।

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