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बच्चे को अकेला कर रही परफेक्ट जिंदगी देने की जिद:भाई-बहन न होने से अहम बातें साझा नहीं होतीं, रूठने-मनाने में भी कमजोर

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पैरेंटिंग को लेकर दुनियाभर में लोगों का नजरिया तेजी से बदल रहा है। दंपती अब एक ही बच्चा चाहते हैं। उन्हें लगता है कि एक बच्चा होगा तो वे उसे हर खुशी, बढ़िया पढ़ाई और ऐशो-आराम दे पाएंगे। लेकिन कभी सोचा है कि ऐसा करके बच्चों को ऐसे एकांत की तरफ धकेल रहे हैं, जहां उनके पास दिल की बात साझा करने के लिए भाई या बहन ही नहीं है…? अमेरिका से लेकर यूरोप तक इकलौते बच्चे वाले परिवारों की तादाद दोगुनी हो चुकी है। प्रजनन दर रिकॉर्ड स्तर पर गिर चुकी है। पर इस ‘क्वालिटी पैरेंटिंग’ के फेर में सबसे खूबसूरत चीज घरों से ओझल हो गई है…भाई-बहनों की प्यारी नोकझोंक, तकिए की लड़ाई और एक-दूसरे का साथ। एक्सपर्ट इसे ‘सिबलिंग स्कूल’ का गुम हो जाना बताते हैं। अमेरिका में हुई स्टडी में पांच या अधिक बच्चों वाली माताओं ने बताया- एक बच्चे की तुलना में पांच बच्चों की परवरिश आसान है, क्योंकि उनमें अच्छे संस्कार और चरित्र का विकास सहज रूप से हो जाता है। इस स्टडी का नेतृत्व चर्चित अमेरिकी अर्थशास्त्री डॉ. कैथरीन पकालुक ने किया। वे कहती हैं,‘इसकी वजह दिलचस्प है- घर में एक से ज्यादा बच्चे होते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से शेयरिंग व केयरिंग सीख जाते हैं। खिलौने साझा करना, रिमोट के लिए झगड़ना और फिर खुद ही मान जाना उनकी आदत बन जाती है। बड़े भाई-बहन खेल-खेल में छोटे बच्चों की देखभाल जैसे- डायपर बदलना, सुलाना और संभालना सीखते हैं। यही माहौल उन्हें बचपन से जिम्मेदार, धैर्यवान और दूसरों की परवाह करने वाला इंसान बना देता है। बच्चों का आपसी प्यार थेरेपी से असरदार एकल बच्चों में तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन बढ़ रहा है। इसके लिए स्मार्टफोन व सोशल मीडिया को दोष देते हैं, पर असल वजह उनके ‘कमरों का सन्नाटा’ है। लॉस एंजेलिस की महिला बताती हैं कि उनका बेटा तनाव से जूझ रहा था, दवाइयां असर नहीं कर रही थीं। छोटी बहन के जन्म के बाद, उसे गोद में लेने से ही उसकी एंग्जायटी खत्म हो गई।’ एक्सपर्ट कहते हैं,‘छोटे बच्चे का बिना शर्त प्यार कई बार थेरेपी से ज्यादा मददगार व असरदार होता है।’ बच्चे ही एक-दूसरे को बेहतर तरीके से गढ़ते हैं: एक्सपर्ट डॉ. कैथरीन कहती हैं,‘आजकल पैरेंट्स बच्चों को सामाजिक बनाने के लिए समर कैंप, स्पोर्ट्स क्लब व एक्टिविटी पर लाखों खर्च करते हैं, जबकि यह सब कुछ भरा-पूरा परिवार बच्चों को घर में ही मुफ्त सिखा देता था। बचपन के शुरुआती 2-3 साल मुश्किल जरूर होते हैं, पर जीवनभर संबल देने वाला भाई-बहन का रिश्ता अमूल्य है। पैरेंट्स कितने भी संसाधन जुटा लें, वे भाई-बहन की कमी पूरी नहीं कर सकते। बड़े परिवारों में बच्चों को संस्कार व व्यावहारिक सीख सहज रूप से मिलते हैं, जैसे बगीचे में पेड़-पौधे एक-दूसरे की छांव में बढ़ते हैं। शुरुआती कठिन वर्षों से घबराएं नहीं, क्योंकि बच्चे ही एक-दूसरे को सबसे बेहतर तरीके से गढ़ते हैं।

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