जब आमिर खान को उनकी पहली पूर्व पत्नी, दूसरी पूर्व पत्नी और होने वाली पत्नी के साथ एक ही कार में यात्रा करते देखा गया, तो स्वाभाविक रूप से हलचल मच गई। कुछ ने इसे आधुनिक कहा। कुछ ने इसे अजीब बताया। बहुत से लोग इसे समझ ही नहीं पाए। लेकिन शायद हम एक बड़ी कहानी को नजरअंदाज कर रहे हैं। हम मिश्रित परिवार (“ब्लेंडेड फैमिली’) की उभरती हुई अवधारणा को देख रहे हैं। यह विचार पश्चिमी समाजों में लंबे समय से सामान्य है, लेकिन भारत में इसे अभी भी संदेह की नजर से देखा जाता है। यहां विवाह को पवित्र माना जाता है, तलाक अब भी कलंक से जुड़ा है और परिवार-न्यायालयों में ऐसे विवादों की भरमार है, जो कई बार खुद विवाह से भी अधिक समय तक चलते हैं। भारत में तलाक को पीढ़ियों तक एक युद्ध की तरह पेश किया गया। इसमें एक खलनायक और एक पीड़ित होना जरूरी था। परिवार पक्षों में बंट जाते थे। बच्चे इससे सर्वाधिक प्रभावित होते थे। पूर्व पति-पत्नी एक-दूसरे के जीवन से गायब हो जाते थे, सिवाय वकीलों और अदालत के आदेशों के जरिये होने वाले संपर्क के। लेकिन अब एक शांत बदलाव शुरू हो रहा है। आमिर खान और किरन राव ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि भले ही उनका विवाह समाप्त हो गया, लेकिन उनका परिवार समाप्त नहीं हुआ। ऋतिक रोशन और सुजैन खान भी तलाक के बाद सफल “को-पैरेंटिंग’ का शायद भारत का सबसे प्रमुख उदाहरण बन गए हैं। वे पारिवारिक आयोजनों में साथ शामिल होते हैं, महत्वपूर्ण अवसरों को साथ मनाते हैं और ऐसा मालूम होता है कि उन्होंने अपने बच्चों की भलाई को अपने अहं से ऊपर रखने का सचेत निर्णय लिया है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सेलेब्रिटी केवल हमारा मनोरंजन नहीं करते। वे संभावनाओं का एक उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं। ऐसे देश में जहां तलाकशुदा महिलाओं से अब भी पूछा जाता है कि क्या गलत हुआ था और जहां तलाकशुदा पुरुषों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, वहां पूर्व पति-पत्नी को बिना सार्वजनिक कटुता के साथ रहते देखना गहराई से जड़ें जमा चुकी धारणाओं को चुनौती देता है। यह संकेत देता है कि तलाक हमेशा असफलता नहीं होता। कई बार यह केवल एक “ट्रांजिशन’ होता है। बेशक, सेलेब्रिटीज़ के जीवन को आदर्श रूप में पेश नहीं करना चाहिए। आर्थिक समृद्धि कई चीजों को आसान बना देती है। नैनीज़, थैरेपिस्ट्स, एक से अधिक घर, लचीली दिनचर्या और आर्थिक सुरक्षा उन तनावों को कम कर सकती है, जिनसे आम परिवारों को जूझना पड़ता है। फिर भी यह सिद्धांत प्रासंगिक है। सवाल यह नहीं है कि क्या दो लोग हमेशा विवाहित रह सकते हैं। सवाल यह है कि क्या विवाह समाप्त होने के बाद भी वे एक-दूसरे के प्रति सदाशय बने रह सकते हैं? जब बच्चे इनवॉल्व हों, तब तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। दुनिया भर के शोध यह दिखाते हैं कि बच्चों को माता-पिता के लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष से अधिक नुकसान होता है। दो शांतिपूर्ण घरों के बीच रहने वाला बच्चा उस बच्चे से बेहतर स्थिति में होता है, जो एक ही तनावपूर्ण घर में ट्रैप्ड रहता है। देश बदल रहा है। महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हो रही हैं। लोग देर से विवाह कर रहे हैं। विवाह से अपेक्षाएं पहले से अधिक बढ़ गई हैं। जाहिर है कि तलाक की दरें भी बढ़ रही हैं। ऐसे में उपरोक्त प्रसंग एक वैकल्पिक कहानी प्रस्तुत करते हैं, जिसमें पूर्व पति-पत्नी भी एक-दूसरे के सहयोगी बने रह सकते हैं और बच्चों को कोई एक पक्ष चुनने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)




