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एन. रघुरामन का कॉलम:मुलायम आंखें भारी सपना क्यों नहीं देख सकतीं?

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सहर बेखौफ होकर पिता की आंखों में देखती हुई कहती हैं कि ‘मैं फिल्मी म्यूजिक पर डांस करना चाहती हूं।’ पंडित हरिनारायण शर्मा की आंखें लाल हो जाती हैं और वे जवाब देते हैं, ‘नहीं, उनके म्यूजिक और डांस में ताल नहीं होती।’ सहर हाथ पकड़कर पूछती है, ‘बताइए, भला कोई म्यूजिक और डांस बिना ताल कैसे हो सकता है?’ शर्मा, जो एक बेहद सम्मानित गुरु और पारिवारिक नृत्य परंपरा के सख्त संरक्षक हैं। वे अत्यंत निष्ठा के साथ अपनी विरासत बचाए रखना चाहते हैं। उनका मानना है कि शास्त्रीय परंपरा के बाहर की हर चीज खोखली और आत्मा-रहित है, जिसके लिए उनके घर में कोई जगह नहीं। लेकिन उनके पास सहर के सवाल का जवाब नहीं होता। वे चुपचाप चले जाते हैं। कठोर अनुशासन में बंधा सहर का जीवन सिर्फ अपने पिता के ड्रम की पारंपरिक और कठिन तालों पर ही चलता है। इसीलिए सहर को एक दर्दनाक दोहरी जिंदगी जीनी पड़ती है। वह दो दुनियाओं में फंसी हैं: छिपकर मॉडर्न डांस की उन्मुक्त ऊर्जा को तलाशना और कर्तव्य व डर के कारण खुद को फिर से शास्त्रीय प्रशिक्षण के कठोर नियमों में बांध लेना। एक दिन शर्मा सहर को फिल्मी म्यूजिक पर परफॉर्म करते पकड़ लेते हैं। और यहीं से दोनों कलाकार एनेट डी’सूजा (सहर) और काश्वी अग्रवाल (पंडित शर्मा) 90 मिनट के डांस-ड्रामा शो ‘परदे में रहने दो’ में अपनी कहानी दर्शकों को सामान्य डायलॉग्स के बजाय शानदार डांस मूवमेंट के जरिए समझाते हैं। यह शो मैंने शनिवार रात देखा था। उनके इस एक्ट ने मुझे 1948 की लीक से हट कर बनी मास्टरपीस और सही मायनों में भारत की पहली डांस फिल्म ‘कल्पना’ की याद दिला दी। इस फिल्म के हीरो, जो रीयल-लाइफ हीरो भी थे, पद्म विभूषण सम्मानित उदय शंकर और डी’सूजा के बीच कई दिलचस्प समानताएं हैं। फिल्म में लीड एक्टर के अलावा शंकर ने इसका स्क्रीन-प्ले लिखा, निर्देशन किया और हर डांस सिक्वेंस को कोरियोग्राफ भी किया। उनकी ऑन-स्क्रीन परफॉर्मेंस में उनके असल जीवन की कहानी भी दिखाई दी। फिल्म में उनका किरदार जिस तरह एक आर्टिस्टिक एकेडमी बनाने के लिए संघर्ष करता है, वह उत्तराखंड में अल्मोड़ा सेंटर बनाने के उनके सफर जैसा ही था। 1938 में शुरू हुआ यह संस्थान हालांकि 1942 में पैसे की कमी के कारण बंद करना पड़ा, लेकिन बाद में उन्होंने 1965 में कोलकाता में उदय शंकर सेंटर फॉर डांस की स्थापना की। इस विजनरी डांसर ने ये एकेडमी अपनी विशिष्ट ‘क्रिएटिव डांस’ शैली को प्रमोट करने के लिए बनाई थी, जिनमें पारंपरिक इंडियन डांस फॉर्म्स और आधुनिक यूरोपीयन स्टेज-क्राफ्ट का मिश्रण था। उनके संस्थानों ने रवि शंकर, गुरु दत्त और जोहरा सहगल जैसे कई महान कलाकारों को प्रशिक्षित किया। ठीक इसी तरह, शो की प्रोड्यूसर, कोरियोग्राफर और सहर की भूमिका निभाने वाली डी’सूजा एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती हैं, जहां वह अपनी असली पहचान को छिपा नहीं पातीं। वह पिता का आशीर्वाद लेने की कोशिश करती हैं, लेकिन वे उनके इस बदलाव को स्वीकार नहीं करते और उनसे मुंह मोड़ लेते हैं। दुखी होने के बावजूद सहर हार नहीं मानतीं और अकेले ही उस इकलौती दुनिया से बाहर कदम बढ़ा देती हैं, जिसे वह अब तक जानती थीं। लेकिन अलगाव से कई बार असाधारण रचनात्मकता आती है। अपने जुनून को मरने न देकर सहर बड़ी कुशलता से अपने शास्त्रीय प्रशिक्षण की मजबूत तकनीक को मॉडर्न डांस की आजादी से जोड़ देती हैं। और इसी से शानदार, बेहद व्यक्तिगत सेमी-क्लासिकल शैली का जन्म होता है। डी’सूजा का डांस-ड्रामा आज के युवाओं के संघर्ष को बताता है, जो अपारंपरिक प्रोफेशन चुनना चाहते हैं। हमारे युवा उस एकल धारा जैसे हैं, जो पीढ़ियों से पत्थर की संकरी नहर में बहते रहे और अचानक उस पुरानी चट्टान को तोड़ देते हैं। उन्हें किसी स्थायी नौकरी में बांध कर ठहरा पानी बनाने के बजाय उस धारा के जैसे बहने दो, जो अपने ऐतिहासिक बहाव को प्राकृतिक परिदृश्य में मिला कर अद्भुत झरना बन जाती है। ‘परदे में रहने दो’ की यह मनमोहक परफॉर्मेंस उस युवा कलाकार की भावनात्मक यात्रा को खूबसूरती से दिखाती है, जो परंपराओं की कठोर दीवारों को तोड़कर अपनी आजादी और अपना आसमान हासिल करता है। यह याद दिलाता है कि हमें भी युवाओं को वही आजादी देनी चाहिए। फंडा यह है कि बच्चों को साहसिक सपने पूरे करने की आजादी देने से उन्हें कलात्मक सफलता मिल सकती है। उदय की एकेडमी जैसी भौतिक इमारतें टूट सकती हैं, लेकिन सच्ची ‘कल्पना’ और कला की अटूट भावना कभी खत्म नहीं की जा सकती।

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