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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:परिवार संस्था के हित के लिए विवाह को लेकर गंभीर रहें

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विवाह संस्था पर धीरे-धीरे ऐसे आक्रमण हो रहे हैं, जिसके परिणाम अभी पता न लगें, लेकिन भविष्य में परिवार इसकी कीमत चुकाएंगे। कुछ सरकारें लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी दायरे में लेकर उसे समर्थन दे रही हैं। एक छत के नीचे बिना विवाह किए स्त्री-पुरुष पति-पत्नी के रूप में रहें, यह कानून का विषय हो सकता है, लेकिन विवाह संस्था की नैतिकता इससे आहत होगी। एक आंकड़ा चौंकाता है कि अरेंज मैरिज 25% घट गई, लव मैरिज का प्रतिशत बढ़ गया। और इसी बीच एक और आंकड़ा निकलकर आता है कि सगाई और शादी के बीच की अवधि छह माह से अधिक हो तो 70% रिश्ते या तो टूट जाते हैं या खटाई में पड़ जाते हैं। युवक-युवती एक-दूसरे की पसंद से विवाह करें, इसकी भी आलोचना नहीं की जानी चाहिए। सीता जी को राम जी ने वाटिका में विवाह पूर्व देखा और स्वीकृति दी। रुक्मिणी जी ने कृष्ण जी को आमंत्रण दिया था। लेकिन इन सभी दृश्यों ने विवाह संस्था का मान किया है, जो हमारे परिवारों के लिए बड़ा आवश्यक है।

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