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एन. रघुरामन का कॉलम:शहरों का दिल कभी गांवों के जैसा नहीं हो सकता

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“नानी, मैं स्कूल जा रहा हूं!’ मैं दरवाजे से चिल्लाकर कहता था और हर सुबह, उनकी तेज लेकिन प्यार से भरी हुई आवाज लौटकर आती थी : “कितनी बार समझाऊं? ऐसा कभी नहीं कहते हैं कि मैं जा रहा हूं, कहो कि मैं स्कूल जाकर आता हूं।’ मैं उनकी ओर देखे बिना मन ही मन में कभी नहीं बुदबुदाता कि “क्या फर्क पड़ता है?’ और मैं वही दोहरा देता जो उन्होंने कहा था और भाग जाता। वे दो शब्द- “आता हूं’- सुरक्षा और आश्वासन का एक अलिखित अनुबंध थे, जिस पर हमारे बुजुर्ग भरोसा करते थे। उन्हें दरवाजे पर खड़े होकर वेव करने या चुंबन उछालने की जरूरत नहीं होती थी। वे हमें जाते हुए बेचैन आंखों से नहीं देखते थे। ये वो दिन थे जब हमारे पास कुछ भी नहीं था और इसके बावजूद हमारे पास किसी चीज की कमी नहीं थी। वे हमें नंगे पांव और खुले दिल से दुनिया में जाने देते थे, इस विश्वास के साथ कि गांव हमें सकुशल लौटा लाएगा। अगर हमारे पैर कीचड़ से भर जाते, तो हम रोते नहीं थे; बस सड़क किनारे लगे हैंडपंप से पानी निकालकर मिट्टी धो देते और कक्षा के फर्श पर आलथी-पालथी मारकर बैठ जाते। उस जमाने में हमें रिपोर्ट कार्ड की भी कोई चिंता नहीं होती थी। केवल पास या फेल मायने रखता था। तब किसी बुजुर्ग से डांट खाना रोजमर्रा की बात थी, इससे किसी को कोई मनोवैज्ञानिक आघात नहीं लगता था। अगर शरारत करने पर कोई बिल्कुल अनजान व्यक्ति हमारे कान उमेंठ देता था, तो हम वकील तलाशने नहीं निकलते थे- हम उसे स्वीकार कर लेते थे। गांव सोशल-पैरेंटिंग की परंपरा निभाता था। हम सभी के थे। तब हमारे लिए शर्म की सबसे बड़ी निशानी क्या थी? ट्यूशन जाना। 1960 के दशक में अतिरिक्त कक्षाओं का मतलब यह था कि आप पहली बार में किसी बात को समझने के लिए पर्याप्त होशियार नहीं हैं। और हमारी सबसे बड़ी विलासिता क्या थी? साइकिल की आगे वाली रॉड या जंग लगे कैरियर पर बैठकर धूल भरी पगडंडियों पर तेजी से चलते चले जाना और फल तोड़ने के लिए साइकिल को किसी सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना। तब हमें ऐसा लगता था जैसे हमने पूरी दुनिया जीत ली हो। वो ऐसे दिन थे, जब अव्वल दर्जे की उम्मीदें सेकंड-हैंड किताबों में रहती थीं। हम किताबों के पन्नों के बीच मोरपंख और पीपल के सूखे पत्ते दबाकर रखते थे, यह भोला विश्वास करते हुए कि इससे हम बुद्धिमान बन जाएंगे। उन नाजुक, कंकाल जैसे दिखने वाले पत्तों- जो फाइन-आर्ट की तरह लगते थे- में निहित हमारा यह विश्वास हमें वह चीज देता था, जो शहर शायद ही कभी दे पाते हैं- शुद्ध और बिना कोई मिलावट वाली उम्मीद। उस समय हर पाठ्यपुस्तक पर भूरे रंग के कवर चढ़ाए जाते थे और उन्हें कपड़े से बने झोलों में करीने से रखा जाता था, क्योंकि वे केवल हमारी नहीं थीं- उन्हें अगले साल “थर्ड-हैंड’ किताबों के रूप में बेचे जाने के लिए भी सहेज रखना होता था। आठवीं कक्षा तक मैंने सेकंड-हैंड किताबों से ही पढ़ाई की थी, जब तक कि उसके बाद पाठ्यक्रम नहीं बदल गया। फिर भी हमारे माता-पिता ने कभी पढ़ाई के बोझ की शिकायत नहीं की। जीवन सीमित साधनों वाला जरूर था, लेकिन उसमें हमें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हम गरीब हैं। दक्षिण भारत के “मंदिरों का शहर’ कहलाने वाले कुम्भकोणम में- जहां मैंने प्राथमिक शिक्षा के वर्षों में अपना बचपन बिताया- संस्कृति किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं सिखाई जाती थी; वह मिट्टी में ही रची-बसी थी। हर गली-मोहल्ले में मंदिर होने के कारण सड़कें स्वयं पवित्र लगती थीं। कोई भी वहां थूकने, कचरा फैलाने या सड़कों को गंदा करने की हिम्मत नहीं करता था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि एक अदृश्य सामाजिक ताना-बाना हमें भूमि, बुजुर्गों, प्राचीन मंदिरों और सदानीरा कावेरी नदी के प्रति सम्मान की भावना से बांधे रखता था। प्रकृति हमारे लिए शोषण करने का संसाधन नहीं थी; बल्कि ऐसी देवी थी, जो हमारे जीवन में सम्मिलित थी। शनिवार को तब मुझे ये यादें सताने लगीं, जब मैंने पढ़ा कि गोवा के 56 गांवों के लोग सरकार के उस फैसले से परेशान हैं, जिसमें उन्हें “शहरी क्षेत्र’ के रूप में पुनर्वर्गीकृत किया जा रहा है। यह सुनकर मेरा दिल बैठ गया। वो लोग केवल जोनिंग कानूनों के खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं; वे अपनी आत्मा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। वे जानते हैं कि जब “विकास’ तेजी से आता है, तो वह उस बाढ़ की तरह होता है, जो किसी समुदाय की मनुष्यता को बनाए रखने वाले शांत, सदियों पुराने सामाजिक ताने-बाने को डुबो देता है। फंडा यह है कि आधुनिक शहर कभी भी उस घर जैसी शांति नहीं रच सकते, जहां कोई बच्चा बाहर निकलते हुए “जाकर आता हूं’ कह सके और उसे भरोसा हो कि बाहर उसकी देखभाल करने वाले “सोशल पैरेंट्स’ मौजूद हैं। आज जब मैं शहरों की भीड़भरी लेकिन उदासीन सड़कों को देखता हूं, तो मुझे पुराने दिनों की उस सुरक्षा की याद सताने लगती है।

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