हाल ही में दो खबरें सामने आईं। पहली यह थी कि भारत के लगभग दस में से नौ वयस्कों में कोलेस्ट्रॉल या अन्य लिपिड का स्तर सामान्य सीमा से ऊपर या नीचे है। दूसरी खबर अमेरिका से आई, जहां ऐसी नई दवाई को मंजूरी मिली है, जो एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को 60% तक घटा सकती है। यह महज संयोग हो सकता है, लेकिन यह एक असुविधाजनक प्रश्न भी उठाता है : क्या किसी बीमारी का बोझ हमें तभी याद दिलाया जाता है, जब उसके इलाज के लिए नया बाजार तैयार होता है? मोटापा घटाने वाली दवाओं का हालिया अनुभव इसका स्पष्ट उदाहरण है। मोटापा वर्षों से बढ़ रहा था। लेकिन नई दवाओं के आते ही मोटापा चिकित्सा और मीडिया की सबसे चर्चित समस्याओं में शामिल हो गया। इससे जागरूकता तो बढ़ी, पर वजन को दवा से ठीक होने वाली बीमारी बना दिया गया। शारीरिक निष्क्रियता, तनाव, प्रोसेस्ड फूड जैसे मूल कारण पीछे छूट गए। भारत में हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और फैटी लिवर बढ़ रहे हैं। हमारी जीवनशैली में बैठना बढ़ा है, चलना घटा है और भोजन में चीनी, मैदा तथा प्रोसेस्ड फूड बढ़े हैं। पिछले कुछ सालों में लिपिड और कोलेस्ट्रॉल उपचार के लक्ष्य लगातार नीचे आए हैं। अधिक जोखिम वाले मरीजों के लिए एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को 55 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से नीचे रखने की सलाह दी जाती है। इससे पहले यह सीमा 70 थी। नई दवा एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को 56 से 59% तक घटा सकती है। लेकिन हर मरीज को इसकी जरूरत नहीं है। यह उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, जिन्हें पहले हृदयाघात हो चुका है, जिनका हृदय जोखिम अधिक है या जिन्हें आनुवंशिक रूप से अत्यधिक कोलेस्ट्रॉल रहता है। इसी समय आईसीएमआर-इंडिया अध्ययन के परिणाम भी आए। यह अध्ययन भारत के 23,665 वयस्कों पर आधारित था और इसमें पाया गया कि 87.3% लोगों में लिपिड से जुड़ी कम से कम एक असामान्यता थी। यहां यह समझना जरूरी है कि इसका अर्थ यह नहीं कि लगभग 90% भारतीयों का खराब कोलेस्ट्रॉल खतरनाक स्तर पर है या उन्हें दवा शुरू कर देनी चाहिए। इसमें वो लोग भी शामिल हैं, जिनका एचडीएल लेवल कम है। यह अच्छा कोलेस्ट्रॉल माना जाता है लेकिन इसको बढ़ाने की दवा नहीं आती है। यह सिर्फ अच्छी और स्वस्थ दिनचर्या से ही बढ़ सकता है। समस्या तब शुरू होती है, जब उपचार से हासिल किए जाने वाले लक्ष्य पूरी आबादी के लिए सामान्य मान लिए जाते हैं। जैसे ही इलाज का लक्ष्य बदला जाता है, लाखों लोग अचानक उस श्रेणी में आ जाते हैं, जिन्हें दवा दिए जाने योग्य माना जाता है। जबकि उनके शरीर में रातोंरात कोई नया नुकसान नहीं हुआ होता। इसे मेडिकलाइजेशन कहते हैं। इसका मतलब है कि किसी जोखिम, शारीरिक भिन्नता या जीवनशैली की समस्या को ऐसी बीमारी में बदल दिया जाए, जिसके लिए लगातार जांच और दवा जरूरी मानी जाने लगे। इसका अर्थ यह नहीं कि कोलेस्ट्रॉल की दवाएं बेकार हैं। असली प्रश्न यह है कि दवा किसे और कितने समय तक चाहिए। एक ओर करोड़ों लोगों को जरूरी उपचार नहीं मिलता, वहीं सम्पन्न वर्ग में जरूरत से अधिक जांच और दवाएं बढ़ रही हैं। थोड़े बढ़े एलडीएल वाला स्वस्थ युवा और हृदयाघात झेल चुका व्यक्ति एक जैसे मरीज नहीं हो सकते। जीवनशैली से पैदा बीमारियों का समाधान गोलियों से नहीं होगा। हमें बेहतर भोजन, सक्रिय जीवन और मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य-सेवाएं चाहिए। समझदार मरीज दवा से इनकार नहीं करता; वह दवा की जरूरत, लाभ और अवधि पर प्रश्न पूछता है और सोच-समझकर निर्णय लेता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)


