ग्लासगो की उस सर्द रात में सर्वेश कुशारे ऊंची छलांग लगा रहे थे और ऐसा लग रहा था मानो उनके साथ भारत भी नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा हो।
हम खेलों को क्यों फॉलो करते हैं? वे हमें क्या सिखाते हैं? क्या खेल हमेशा केवल पदक जीतने और रिकॉर्ड तोड़ने तक ही सीमित होते हैं? या फिर इनके भीतर कोई गहरी अंतर्कथा और ऐसा जीवन-सूत्र भी छिपा होता है, जो हम सभी को प्रेरित कर सके? क्या प्रतिस्पर्धी खेलों में सामूहिक भावना सामने आती है? खेल भावना, टीमवर्क और खेल की नैतिकता- क्या ये वास्तव में अस्तित्व रखते हैं? सच यह है कि जब हम खेल देखते हैं, तो केवल पदक जीतने वाला प्रदर्शन ही नहीं देखते, उसके पीछे की कहानी का भी महत्व होता है। और उन कहानियों का भी जो अकसर सामने ही नहीं आ पातीं। यही कारण है कि हमें केवल उस विजेता का ही उत्सव नहीं मनाना चाहिए, जिसके गले में पदक हो, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया और तैयारी का भी अभिवादन करना चाहिए, जिसने उसे वहां पहुंचाया। ग्लासगो में सर्वेश को भारत के लिए ऊंची कूद का दुर्लभ पदक जीतते देखते समय ये तमाम बातें मेरे जेहन में घूम रही थीं। 2.25 मीटर की उनकी छलांग उन्हें रजत पदक दिलाने के लिए पर्याप्त रही और 2026 में उनके शानदार प्रदर्शन का सिलसिला भी जारी रहा। राष्ट्रीय रिकॉर्ड 2.31 मीटर की छलांग, डायमंड लीग में तीसरा स्थान और फिर राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक- 31 वर्षीय सर्वेश लगातार बाधाओं को चुनौती दे रहे हैं और साबित कर रहे हैं कि उम्र केवल एक संख्या है। लेकिन यह कहानी केवल सर्वेश की नहीं है। वे पदक विजेता थे, सफलता के प्रतीक थे, लेकिन इस कहानी के एक और नायक भी थे। वे- जो उस रात लक्ष्य से पीछे रह गए थे, लेकिन उन्होंने निराशा को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इसके बजाय, वे पूरे समय वहीं डटे रहे, ताकि सर्वेश का सपना साकार हो सके। उन्होंने उनका उत्साह बढ़ाया, उन्हें सलाह दी, उनका मार्गदर्शन किया और जब भी जरूरत पड़ी, सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में उनका हाथ थामे रखा। ऐसा करते हुए उन्होंने अपनी भावनाओं को दबा लिया और अपने टूटे मन को कभी सामने नहीं आने दिया। उनके आंसू इसलिए थम गए थे, क्योंकि टीजे (तेजस्विन शंकर) उस पल को सर्वेश के लिए जी रहे थे। यदि सच्चे टीमवर्क का कोई उदाहरण देखना हो, तो वह स्कॉट्सटाउन स्टेडियम में देखने को मिला, जहां सर्वेश और टीजे ने उत्कृष्टता की साझा तलाश में एक-दूसरे का साथ दिया और देश को रजत पदक दिलाया। खेल के बाद मुझे होटल में टीजे और सर्वेश से मिलने का अवसर मिला। रिसेप्शन पर मौजूद कर्मचारी ने टीजे से पूछा कि क्या उन्होंने कोई पदक जीता है। कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। फिर टीजे ने शांत स्वर में कहा, मैं नहीं जीत पाया, लेकिन मेरे दोस्त ने जीता है। मैं उसके लिए खुश हूं। रिसेप्शनिस्ट स्तब्ध रह गया, जबकि टीजे मुस्कराए और वहां से आगे बढ़ गए। सर्वेश के साथ अपनी विस्तृत बातचीत के दौरान मैंने उनसे टीजे के बारे में पूछा। सर्वेश ने कहा, वह मेरे भाई जैसा है। उसके पास बहुत अनुभव है। उसने अमेरिका में प्रशिक्षण लिया है, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है और वो इन परिस्थितियों को मुझसे कहीं बेहतर समझता है। वह केवल मुझे यह नहीं बता रहा था कि परिस्थितियों के अनुसार खुद को कैसे ढालना है, बल्कि वह मेरे वार्म-अप, रन-अप और तकनीक पर भी लगातार नजर रख रहा था और हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन कर रहा था। मुझे उसके लिए दु:ख हुआ, क्योंकि मुझे विश्वास था कि वह भी पदक जीत सकता है। लेकिन उसने एक पल के लिए भी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह निराश है। वह पूरे समय मेरे साथ खड़ा रहा। ऐसा लग रहा था मानो वह मेरे साथ ही छलांग लगा रहा हो। हमें अकसर बताया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय खेलों की दुनिया अकेले की यात्रा होती है। यह कि शीर्ष खिलाड़ी बेहद निर्मम होते हैं और बड़ी प्रतियोगिताओं में प्रतिस्पर्धा की भावना ही सबसे ऊपर होती है। लेकिन यहां ऐसा नहीं था। कम-से-कम राष्ट्रमंडल खेलों में सर्वेश और टीजे के मामले में तो बिल्कुल नहीं। वहां जो देखने को मिला, वह दुर्लभ था, हर भारतीय को प्रेरणा लेनी चाहिए। भारतीय एथलेटिक्स और भारतीय ओलिम्पिक खेलों की अकसर आलोचना होती है, लेकिन कुछ पल ऐसे होते हैं, जो पदक जीतने के बाद भी देर तक स्मृतियों में बने रहते हैं। यह भी ऐसा ही पल था। जब आप टीजे और सर्वेश से बात करते हैं, तो एहसास होता है कि यह सब पूरी तरह वास्तविक था। बेहद मानवीय। खेलों के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप की याद दिलाने वाला। जब हम खेल देखते हैं, तो केवल पदक जीतने वाला प्रदर्शन ही नहीं देखते, उसके पीछे की कहानी का भी महत्व होता है। और उन कहानियों का भी जो अकसर सामने नहीं आ पातीं। ग्लासगो में हमने यही अपनी आंखों के सामने घटते देखा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



