यह आपके राजनीतिक रुझान पर है कि जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसे आप क्रांति मानें या एक आई-गई आंधी। पर इतना तो निश्चित रूप से हुआ कि पहली बार सरकार के खिलाफ सीधा जनाक्रोश उभरा और उसकी खुली निंदा हुई। 20 जुलाई के बाद सरकार ने अगर तत्परता से कदम उठाए तो इसकी असली वजह यह थी कि विरोध कर रहे 95 फीसदी युवा, मुख्यतः बच्चे मध्य और उच्च मध्यवर्गीय हिंदू परिवारों के थे। ये ही तो उसके मूल जनाधार हैं। आप उन्हें ‘जेन-जी’ कह सकते हैं और उनकी भाषा, लहजे या उनकी गालियों पर बहस करके उनके विद्रोह को खारिज कर सकते हैं। यह ‘जेन-जी’ किस तरह अलग ढंग से सोचती है, इस पर चाहे सैकड़ों ‘परिचर्चाएं’ कर लीजिए, उन्होंने जिस प्रतिरोध का प्रदर्शन किया, उसे खारिज नहीं किया जा सकता। सबसे पहली बात तो यह है कि यह प्रतिरोध उन्होंने बड़े शारीरिक जोखिम के बावजूद किया, जिसका सबूत यह है कि पिटाई के बाद भी वे वहां फिर से जमा हुए। दूसरे, उन्होंने अपने करियर की चिंता न करते हुए लगभग बेपरवाह निडरता का प्रदर्शन किया। यह वीपी सिंह के छोटे कार्यकाल के दौरान हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन के बाद नई दिल्ली में छात्रों का सबसे उग्र आंदोलन था। उस आरक्षण विरोधी आंदोलन में उस समय के युवाओं ने भाग लिया था, जिसमें सुरिंदर सिंह चौहान और राजीव गोस्वामी (जिसकी मौत भी हो गई थी) जैसे कुछ युवाओं ने आत्मदाह तक करने की कोशिश की थी। दोनों आंदोलनों के पीछे चिंता के मुद्दे समान थे- करियर, नौकरी, शिक्षा। पहला आंदोलन घोषित रूप से ‘ऊंची जातियों’ का था, यह आंदोलन ज्यादातर अंग्रेजी भाषी, मीम बनाने वाले उच्च-मध्यवर्गीय युवाओं का था। दोनों पीढ़ियों के बीच चार दशक का फासला था, लेकिन दोनों ने पुलिस या दमन की कोई परवाह नहीं की। इन युवाओं ने कुलीन तबकों की खुद की ओढ़ी उस चुप्पी को तोड़ दिया, जो उन्हें सरकार की आलोचना में खुलकर बोलने से रोकती थी। यह बहुत हद तक सीधी चुनौती देता विरोध था। युवाओं ने दिखाया कि एक बड़ी आबादी उन लोगों की है, जिन्हें ‘विकसित भारत’ या ‘अमृत काल’ जैसे नारों पर विश्वास नहीं है। आज के ‘जेन-जी’ में जो बड़ी उम्र वाले हैं, वे 2047 तक 50 के हो जाएंगे, और जो सबसे कम उम्र के हैं, वे 35 की उम्र के हो जाएंगे। तब तक इनकी जिंदगी लगभग बीत चुकी होगी। इतना लंबा इंतजार करने का धैर्य किसके पास है? इन नारों से 50 से ज्यादा उम्र के मतदाता प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन बच्चे उतनी दूर तक नहीं देख सकते। इस आंदोलन से सरकार के आलोचकों में यह भावुक धारणा बनी कि भारत में भी कोलंबो/ढाका/काठमांडू को दोहराया जा सकता है। लेकिन यह धारणा भारतीय लोकतंत्र, उसके ‘सिस्टम’ की मजबूती के प्रति अनादर ही दर्शाती है। यह इस मुगालते को भी उजागर करती है कि किसी निर्वाचित सरकार को आसानी से हटाया जा सकता है। तथ्य यही है कि भाजपा को भले ही केवल 240 सीटें मिली हों, लेकिन करीब 24 करोड़ मतदाताओं ने उसे वोट दिया। इसके बाद सबसे ज्यादा वोट कांग्रेस को मिले, लेकिन भाजपा को उसके मुकाबले करीब दोगुने ज्यादा वोट मिले। वैसे आंदोलनकारियों ने सरकार के विरोधियों के लिए दरवाजा थोड़ा तो खोल दिया ही है। उन्होंने दिखा दिया कि नाव में छेद हैं। सरकार की अपने सबसे निष्ठावान जनाधार में अपनी लोकप्रियता को लेकर जो धारणा है, उसमें और वास्तविकता में अंतर बढ़ रहा है। उस जनाधार में ऐसे लोगों की संख्या में वृद्धि हो रही है, जो सरकार से बेजार हो रहे हैं। यह मुझे 2018 में छत्तीसगढ़ के चुनाव के दौरान एक गांव में हुई उस बातचीत की याद दिला रहा है, जिसमें प्रणय रॉय, दोरब सुपारीवाला के साथ मैं भी शामिल था। हमने एक ग्रामीण से पूछा था कि रमन सिंह की सरकार आप लोगों को इतना कुछ दे रही है फिर भी आप बदलाव क्यों चाहते हैं? उनका जवाब था- यह सरकार कितने लंबे समय से राज कर रही है! आपको कोई सब्जी कितनी भी पसंद हो, रोज-रोज एक ही सब्जी खाते-खाते क्या आप ऊब नहीं जाएंगे? उस शाम टीवी पर चर्चा के दौरान प्रणय ने मुझसे पूछा था कि क्या मैं एक ही सब्जी खाते-खाते ऊबूंगा नहीं? मैंने जवाब दिया था, नहीं ऊबूंगा अगर वह भिंडी की होगी। यह तो मजाक की बात थी, मगर गंभीर नतीजा यह सामने आया कि चुनाव परिणाम ने सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसका सबक यह था कि थकान और ऊब पुराने वफादार मतदाताओं में भी खीझ पैदा कर सकती है। अब 2029 तक के लिए प्रतियोगी राजनीति का जोर उस दरार को पाटने या उसे और चौड़ा करने पर होगा, जो ‘जेन-जी’ ने बना दी है। भाजपा ने इस समस्या को समझ लिया है। इसीलिए प्रधानमंत्री अब इंस्टाग्राम पर संदेश देने लगे हैं। लेकिन क्या वे अपनी सरकार में नई जान फूंक पाएंगे? मंत्रिमंडल में उन्हीं-उन्हीं चेहरों की कुर्सियां बदलती रही हैं। शिक्षा मंत्रालय के छह मुखिया बदले जा चुके हैं। कौशल विकास मंत्रालय चार मंत्री देख चुका है, लेकिन यह मंत्रालय सफल हुआ होता तो बेरोजगारी या अर्ध-बेरोजगारी में कमी आई होती। योजना आयोग को तो खत्म कर दिया है लेकिन योजना मंत्रालय कायम है। एमएसएमई से लेकर भारी उद्योग तक- इनमें से हर मंत्रालय रोजगार पैदा करने में भूमिका निभा सकता है। लेकिन आपने इनके बारे में कोई चर्चा सुनी? विपक्ष को भी याद रखना होगा कि सत्ता आसमान से नहीं टपक जाती। भारत में किसी ताकतवर नेता को चुनौती देने वाला उसे परास्त नहीं कर पाया है। उसे अपनी हार का खुद ही कारण बनना पड़ता है। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को अपनी हार का कारण बनाया, राजीव गांधी ने शाह बानो से लेकर अयोध्या तक अपनी कई भूलों को, अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘भारत उदय’ के धोखे में समय से पहले चुनाव करवाकर। हर बार कोई ताकतवर नेता तभी हारा है, जब विपक्ष को किसी ऐसी हस्ती का सहारा मिला, जिसने लहर पैदा की। इंदिरा के विरोध में जेपी खड़े हुए, तो राजीव के खिलाफ वीपी। इंदिरा, राजीव और यूपीए के तख्तापलट में संघ की भी भूमिका रही। कांग्रेस की कमजोरी यह है कि उसके पास ऐसी कोई निष्ठावान पैदल-सेना नहीं है। इस नए अवसर का लाभ उठाने के लिए उसके पास तीन साल का समय है, लेकिन भाजपा के पास भी खुद को तैयार करने के लिए इतना ही समय है। हार का कारण खुद ही…
भारत में किसी ताकतवर नेता को चुनौती देने वाला उसे परास्त नहीं कर पाया है। उसे अपनी हार का खुद ही कारण बनना पड़ता है। बहरहाल, इंदिरा, राजीव और यूपीए के तख्तापलट में जेपी-वीपी के साथ ही संघ की भी भूमिका रही थी। कांग्रेस की कमजोरी यह है कि उसके पास ऐसी कोई निष्ठावान पैदल-सेना नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
शेखर गुप्ता का कॉलम:राजनीति में अब नए विचारों की जरूरत है

