Site icon Socialblize

शेखर गुप्ता का कॉलम:जेन-जी को संघ के समर्थन में एक सबक है

संघ के सौ साल पूरे होने के साथ ही संघ प्रमुख मोहन भागवत भी अपनी छवि में नाटकीय परिवर्तन लाए हैं। उन्होंने अपने समर्थकों और आलोचकों को भी उलझन में डाल दिया है। कुछ लोगों को लग रहा है कि वे जो उदारवादी रुख अपना रहे हैं, उसके कारण संघ के ठोस वैचारिक आधार से किनारा किया जा रहा है। इसके कारण एक ऐसा समूह उभरा है, जो पुराने रूढ़िवाद और राष्ट्रवाद से चिपका है और मानता है कि भागवत के नेतृत्व में संघ इस विचार से अलग हो रहा है। उदारवादी जमात में कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें भागवत ने राहत दी है। क्या यह बदलाव की बयार है? क्या वे सरकार को चेता रहे हैं? क्या वे संघ की विश्वदृष्टि को मध्यमार्ग के करीब ला रहे हैं? यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि संघ की मूल विचारधारा में कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है। जो कुछ दिख रहा है, वह सत्ता के 13वें साल में राजनीतिक व्यावहारिकता का प्रदर्शन है। पिछले करीब पांच साल से, भागवत कई प्रमुख मसलों पर संघ के रुख में बदलाव को उजागर करते रहे हैं या उसके रुख को अलग तरह से प्रस्तुत करते रहे हैं। वे कई बार कह चुके हैं कि भारत (बल्कि इस पूरे उपमहादेश) के हर व्यक्ति का ‘डीएनए’ समान है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस धर्म का है। वे यह भी कह चुके हैं कि हरेक मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजना बंद कीजिए। वे, और उनके उत्तराधिकारी माने जा रहे दत्तात्रेय होसबले भी कह चुके हैं कि भारत को पाकिस्तान के साथ रिश्ता बनाए रखना चाहिए। इसे वे दोनों देशों की जनता के बीच संपर्क वाला रिश्ता कह सकते हैं, लेकिन यह सरकारी रुख से एक कदम आगे वाला रिश्ता है। यह सब बदलाव को दर्शाता है, जिसने कट्टरपंथियों को नाराज किया है, तो उदारवादियों को उत्साहित किया है। इन्हीं वजहों से पांच प्रमुख मुस्लिम हस्तियों ने 22 अगस्त 2022 को भागवत से संपर्क किया था और संवाद करने की इच्छा जाहिर की थी। अगर उदारवादी समुदाय सहायता के लिए संघ नेतृत्व की ओर देखता है तो कहा जा सकता है कि भारत ने आगे की तरफ कुछ कदम बढ़ाया है। आप इसे संशय की नजर से भी देख सकते हैं, और उम्मीद भरी नजर से भी। यह भी मुमकिन है कि जब सरकार खास तौर से मुश्किल में फंस जाए- जैसे कि जंतर-मंतर प्रकरण- तब वे अच्छे रक्षक की भूमिका में आ जाएं। जिस मंत्री को इस्तीफा दिलवाना पड़ा, वे संघ की भी प्रमुख हस्ती थे। पहले यह देखना चाहिए कि इससे पहले क्या-क्या कहा गया। भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने जेन-जी को ‘जेन गटर’ बता दिया था। 30 जुलाई को संघ के संयुक्त महासचिव अतुल लिमये ने महाराष्ट्र के में अभाविप कार्यकर्ताओं को भाषण देते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर राष्ट्र विरोधी नारे लगाए गए। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में वामपंथियों की वैकल्पिक राजनीति के विचार की अच्छी परीक्षा हो गई और ऐसी अराजकतावादी शक्तियां घातक हैं। जाहिर है, भागवत इस सब पर नजर रखे हुए थे और सरकार के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को लेकर चिंतित थे। इसीलिए उन्होंने भारत के ‘इंटरनेशनल मूवमेंट टु यूनाइटेड नेशन्स’ की ओर से ‘जेन-जी और जेन-अल्फा’ के साथ सवाल-जवाब के आयोजन में भाग लेने का न्योता कबूल किया। इसमें भागवत ने सबसे पहला काम तो यह किया कि जेन-जी के आंदोलनकारियों को राष्ट्र-विरोधी बताने वाली आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, मुझे जेन-जी पर पूरा भरोसा है। विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, यह राष्ट्र-विरोधी काम नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विरोध और आंदोलन सर्वसहमति बनाने का बुनियादी हिस्सा होता है और युवाओं की शिकायतें और सुधारों की मांग जायज है। उन्होंने कहा कि शिक्षा पर जीडीपी की 6 फीसदी के बराबर राशि खर्च की जानी चाहिए। उनसे जब पूछा गया कि वे किस पीढ़ी पर ज्यादा भरोसा करेंगे, तो उनका जवाब था कि वे जेन-जी को ही चुनेंगे। उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन लोकतांत्रिक संवाद की प्रक्रिया के जायज और वैध तत्व होते हैं, खासकर तब, जब संवाद के सामान्य रास्ते बंद हो गए हों। वे इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने कहा, युवा लोग थोपी गई बातों के मुकाबले संवाद के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं। उनसे प्रश्न रहित आज्ञाकारिता की उम्मीद मत रखिए। युवा पीढ़ी का सम्मान कीजिए। इसके बाद कंगना रनौत ने अपना जेन-जी राष्ट्र विरोधी है वाला तेवर बदला और संसद के बाहर खड़े पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि जेन-जी हमारी सबसे बड़ी ताकत है और हमें उस पर गर्व है। भागवत की ओर से और भी ज्यादा महत्वपूर्ण चेतावनी तब दी गई, जब उनसे युवा पीढ़ी को नेतृत्व के बारे में सीख देने का आग्रह किया गया। उनसे पूछा गया कि उनके मुताबिक भावी नेताओं में तीन आदर्श विशेषताएं क्या होनी चाहिए? उनका जवाब था कि सबसे पहले तो नेतृत्व का अर्थ है टीमवर्क यानी एक टीम के रूप में काम करना। उन्होंने कहा कि असली नेता तो वह होता है जो पीछे रहकर काम करता है। साथ ही उन्होंने कहा कि नेतृत्व उसे कहेंगे जो नेताओं का निर्माण करे, केवल खुद ही नेता न बना रहे। अब इस पर तो सवाल उठेंगे ही कि उनका इशारा किस तरफ है। यह ऐसा सवाल है, जिसे भाजपा के अंदर उठाने की हिम्मत कोई नहीं करेगा। लेकिन यह अनदेखा नहीं रहेगा। संसद के मानसून सत्र के दबाव के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने एक्स पर इंदिरा गांधी की एक पुरानी क्लिपिंग शेयर की थी, जिसमें वे एक विदेशी मीडिया से बात करते हुए इमरजेंसी को जायज ठहराती हैं। इंदिरा ने कहा था कि भारत को बाहर से और अंदर से भी खतरा पैदा हो गया था। उन्होंने कहा था कि ये वो लोग थे, जो मानते थे कि वे चुनाव के जरिए जीत नहीं हासिल कर सकते तो लड़ाई को सड़कों पर ले जाएंगे। अब यह तो बहस का मुद्दा बना रहेगा कि क्या इंदिरा वास्तव में इतनी घिर गई थीं कि उन्हें इमरजेंसी लगाने की भूल करनी पड़ी। लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें इस दुस्साहस के खिलाफ सावधान करने वाली कोई ताकत नहीं थी- कोई वरिष्ठ सलाहकार, मार्गदर्शक, पारिवारिक बुजुर्ग या गुरु नहीं था। शायद आज भागवत और संघ सरकार के लिए इसी कमी को पूरा कर रहे हैं। अच्छे रक्षक की भूमिका में…
अगर उदारवादी समुदाय सहायता के लिए संघ नेतृत्व की ओर देखता है तो कहा जा सकता है कि भारत ने आगे की तरफ कुछ कदम बढ़ाया है। आप इसे संशय की नजर से भी देख सकते हैं, और उम्मीद भरी नजर से भी। यह भी मुमकिन है कि जब सरकार मुश्किल में हो, तब संघ एक अच्छे रक्षक की भूमिका में आ जाता हो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Exit mobile version