कभी-कभार असंभव लगने वाली कहानियां भी रहस्यमयी रूप से सच हो जाती हैं। हर दिन करोड़ों लोग सिस्टम को बदलने का सपना देखते हैं, लेकिन बहुत कम सफल हो पाते हैं। इसीलिए 30 वर्षीय अभिजीत दिपके के अप्रत्याशित उभार को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। किसने सोचा होगा कि 16 मई को ‘कॉकरोचों’ से एकजुट होने की अपील करने वाला उनका एक ट्वीट युवाओं के देशव्यापी आंदोलन में तब्दील हो जाएगा और अंततः एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देना पड़ेगा? कुछ समय पहले तक दिपके और उनकी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को देश में शायद ही कोई जानता था। आज हालात ये हैं कि टीवी चैनलों की टीमें, यूट्यूबर और बड़े राजनेता उनके सम्भाजीनगर स्थित साधारण से घर का रास्ता तलाश रहे हैं। जिसे बहुत-से लोगों ने महज ऑनलाइन ट्रेंड समझकर खारिज कर दिया था, अचानक वह साल की सबसे बड़ी सियासी खबरों में से एक बन गया। बहरहाल, सीजेपी ने तात्कालिक लड़ाई भले जीत ली हो, उसकी असल चुनौती अब शुरू होती है। क्या सीजेपी को महज एक प्रेशर-ग्रुप बने रहना चाहिए, या वह चुनावी राजनीति में भी उतरेगी? हाल ही में मैंने यही सवाल दिपके से पूछा। उन्होंने तत्काल जवाब दिया कि ‘हमने राजनीतिक दल बनाने के बारे में सोचा तक नहीं है। हम ऐसा आंदोलन बने रहना चाहते हैं, जो लोकतंत्र में जवाबदेही की मांग करता हो।’ देश ने पहले भी यह बात सुनी है। 2011 में अरविंद केजरीवाल बार-बार कहते रहे थे कि उनकी राजनीति में आने की कोई योजना नहीं है, लेकिन महज दो साल बाद वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। हर सफल प्रतिरोध-आंदोलन अंतत: इसी उलझन में फंस जाता है- नैतिक शक्ति को राजनीतिक ताकत में कैसे बदला जाए, बगैर उस साख को खोए, जिसने वह नैतिक शक्ति दी थी? इस उलझन को दिपके बहुत-से लोगों से बेहतर समझते हैं। चूंकि उन्होंने आम आदमी पार्टी के साथ काम किया था, इसलिए वे कहानी के दोनों पहलू देख चुके थे। ‘आप’ ने साबित किया कि जनता की नाराजगी को चुनावी सफलता में बदला जा सकता है। लेकिन उसने यह भी दिखाया कि जब कोई आंदोलन प्रतिस्पर्धी राजनीति की कठोर दुनिया में प्रवेश करता है- जहां गठबंधन, समझौते और संगठनात्मक मजबूरियां अपरिहार्य हो जाती हैं- तब उसकी नैतिक शुचिता बनाए रखना कितना कठिन हो जाता है। इतिहास बताता है कि हर सफल राजनीतिक बदलाव के लिए जनाक्रोश से अधिक भी कुछ चाहिए होता है। उसके लिए सही टाइमिंग और एक स्पष्ट सामाजिक आधार जरूरी होता है। केजरीवाल केवल भ्रष्टाचार-विरोधी लहर पर सवार नहीं हुए थे। वे भारत के बढ़ते शहरी मध्यम वर्ग की आवाज बने थे। यह वो पढ़ा-लिखा वर्ग था, जो भ्रष्टाचार, बदतर सार्वजनिक सेवाओं और आमजन की चिंताओं से कटे हुए तंत्र से हताश था। यही वर्ग ‘आप’ की मजबूत नींव बना। हर सफल राजनीतिक स्टार्टअप को ऐसा ही नैसर्गिक समर्थन-आधार चाहिए होता है। नैतिक आक्रोश किसी आंदोलन को जन्म तो दे सकता है, लेकिन चुनाव में शायद ही टिक पाता है। यही बात हमें उस सवाल तक ले आती है, जिसका सामना दिपके कर रहे हैं। आखिर सीजेपी का प्रमुख समर्थक वर्ग कौन है? क्या वह बार-बार पेपर लीक से परेशान जेन-जी है? नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे बेरोजगार स्नातक हैं? या वो महत्वाकांक्षी निम्न-मध्यम वर्ग है, जो सोचता है कि उसे भारत की विकास-यात्रा में अलग-थलग कर दिया गया है? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, किसी आंदोलन का चुनावी ताकत में बदल पाना बेहद कठिन होगा। भाजपा आज भी देश की सबसे प्रभावशाली चुनावी ताकत है। एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा करवा देना यकीनन बड़ी उपलब्धि है, लेकिन भाजपा जैसी मजबूत चुनावी मशीनरी को मात दे पाना बिल्कुल अलग बात है। दरअसल, सीजेपी की सबसे बड़ी ताकत इसी तथ्य में निहित है कि वह राजनीतिक दल नहीं है। इस आंदोलन ने जनता के दिल में जगह इसीलिए बनाई, क्योंकि यह पारंपरिक दलगत राजनीति से ऊपर था। इसने युवाओं को अपनी नाराजगी व्यक्त करने का एक मंच दिया। यह नैतिक विश्वसनीयता बेहद कीमती है। एक बार गंवा दी तो शायद ही कभी वापस मिल पाए। जैसे ही कोई आंदोलन चुनावी राजनीति में प्रवेश करता है, उसका हर निर्णय किसी समझौते जैसा हो जाता है। जो संगठन कभी बाहर से व्यवस्था को चुनौती देता था, धीरे-धीरे उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। शायद इसीलिए सीजेपी प्रेशर ग्रुप ही बने रहना चाहती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
राजदीप सरदेसाई का कॉलम:सीजेपी “प्रेशर-ग्रुप’ ही बनी रहेगी या फिर राजनीति में भी उतरेगी?

