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मनोज जोशी का कॉलम:अपनी 250वीं सालगिरह से पहले पसोपेश में है अमेरिका

कल (4 जुलाई को) अमेरिका अपना 250वां जन्मदिन मनाएगा। लेकिन जो अवसर उत्सव का होना चाहिए था, वह आत्म-अवलोकन की घड़ी जैसा बन गया है। पूरी दुनिया अमेरिका को एक सफल देश के तौर पर देखती है, लेकिन खुद अमेरिकी अभी निराश मनःस्थिति में हैं। गैलप के एक सर्वे के अनुसार वर्ष 2000 में लगभग 55% अमेरिकी मानते थे कि देश की सफलता देखकर अमेरिका के संस्थापक खुश होंगे। लेकिन आज महज 19% ही ऐसा सोचते हैं। दूसरे शब्दों में, अमेरिका ने अपने संस्थापकों की गरिमा घटाई है। पहली नजर में इसका दोष ट्रम्प के भ्रष्ट प्रशासन पर मढ़ा जा सकता है। यह सच भी है कि बीते एक दशक में ट्रम्प के उभार, पतन और फिर से उभार ने अमेरिकी राजनीति में उथल-पुथल मचाई है। लेकिन समस्याएं इससे कहीं ज्यादा जटिल हैं, जो अमरीकी समाज के विभाजनों में छिपी हैं। एक ओर ‘मागा’ का नेटिविस्ट और दक्षिणपंथी आंदोलन है, जो ‘ट्रम्प-भक्तों’ और ‘अमेरिका-फर्स्ट’ समर्थकों के बीच बंटता जा रहा है। ट्रम्प के भक्त आंख मूंदकर उन्हें समर्थन देते हैं, जबकि अमेरिका-फर्स्ट के समर्थक राष्ट्रवादी विचारधारा वाले हैं और ट्रम्प की कई नीतियों पर असहमत होते हैं। ‘अमेरिका-फर्स्ट’ आंदोलन के प्रभावशाली चेहरों में शुमार टकर कार्लसन और मार्जोरी टेलर ग्रीन कभी मागा मूवमेंट के भी मजबूत समर्थक थे, लेकिन अब उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी छोड़ दी है। अब वे ट्रम्प की नीतियों और ईरान के खिलाफ युद्ध को अपने ही आंदोलन से विश्वासघात बता रहे हैं। ट्रम्प की वापसी में मदद करने वाले थियो वॉन, टिम डिलन और कैंडेस ओवेन्स जैसे पॉडकास्टर भी अब ट्रम्प विरोधी हो चुके हैं। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी भी सोशलिस्ट ताकतों के दबाव में है। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी द्वारा समर्थित तीन उम्मीदवारों की डेमोक्रेटिक प्राइमरी में जीत इसका ताजा संकेत है। न्यूयॉर्क के कुछ अपार्टमेंट्स का किराया फ्रीज करने का निर्णय भी वहां के 25% निवासियों को फायदा देगा। पिछले साल गैलप सर्वे में सामने आया कि डेमोक्रेट्स पूंजीवाद की तुलना में समाजवाद को अधिक पसंद करते हैं। 30 से कम आयु के लोगों में विचारधारा का यह अंतर सर्वाधिक है। अमेरिकियों में इजराइल के प्रति घटता समर्थन घरेलू उथल-पुथल का एक और संकेत है। ताकतवर लॉबियों के समर्थन के कारण इजराइल को पहले डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों का मजबूत समर्थन प्राप्त था। लेकिन हालात अब बदले हुए हैं। 60% अमेरिकी इजराइल को नकारात्मक दृष्टिकोण से देखते हैं, जिनमें लगभग 80% डेमोक्रेट्स हैं। एआई एक और क्षेत्र है, जिस पर विभाजन दिख रहा है। इस पर नियंत्रण को लेकर डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकंस में मजबूत श्रमिक-समर्थक गठबंधन बन रहे हैं। एक ओर वो लोग हैं, जो उत्पादकता बढ़ाने के लिए एआई का उपयोग कर रहे हैं, दूसरी ओर वो हैं, जिनकी नौकरियां ऑटोमेशन के चलते खतरे में हैं। एआई डेटा सेंटरों और पावर प्लांटों के खिलाफ भी विरोध बढ़ रहा है। लोगों की आपत्ति है कि इससे बिजली का बिल और शोरगुल बढ़ेगा। इन सभी विभाजनों का असल कारण एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जो आम अमेरिकियों में भरोसा खो चुकी है। दशकों तक अमेरिका ने दुनिया को, और खुद के लोगों को उन्नति का सपना बेचा था। वही सपना अब गंभीर सवालों में घिरा है। वेतन वृद्धि, संपत्तियों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी की तुलना में पिछड़ गई। यानी जिन लोगों के पास संपत्ति और शेयर हैं, वे और अमीर हो गए। जबकि वेतन पर निर्भर लोग पीछे छूट गए। लंबे समय तक अमेरिकी लोकतंत्र का आधार रहा मध्यम वर्ग सिकुड़ रहा है। एक पूरी पीढ़ी छात्र ऋण के बोझ तले दबी है। हेल्थ केयर लाखों लोगों के लिए बेहद महंगी बनी हुई है। बड़े शहरों में मकानों की बढ़ती कीमतों ने खुद के घर के सपने को दूर की कौड़ी बना दिया है। आज हम जो देख रहे हैं, वह एक अराजक प्रक्रिया है, जिसे ट्रम्प ने जन्म दिया है। उन्होंने ऐसी पॉपुलिस्ट ताकतों को बढ़ावा दिया, जो अब डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों ही दलों के स्थापित ढांचे को कमजोर कर रही हैं। 250 वर्ष का अमेरिका आज न तो निर्णायक पतन की ओर अग्रसर है, न ही पूरी तरह स्वस्थ है। वह उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है और दुनिया चिंता के साथ उसे देख रही है। 250 वर्ष का अमेरिका आज न तो निर्णायक पतन की ओर अग्रसर है, न ही पूरी तरह से स्वस्थ है। उसका समाज बंटा हुआ है और राजनीति दुविधाग्रस्त है। वह उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है और दुनिया चिंता के साथ उसे देख रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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