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प्रियदर्शन का कॉलम:देश, समाज, जीवन की फिक्र भी पढ़ाई का जरूरी हिस्सा है

देश में जल्द ही विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसर खुलने वाले हैं- यह बात उन छात्रों को सुकून देने वाली है, जो अंतरराष्ट्रीय तौर पर प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढना तो चाहते हैं लेकिन जिनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे बाहर रहने का खर्च उठाकर यह कर सकें। आने वाले वर्षों में ऐसे छात्र इन विश्वविद्यालयों से लाभान्वित हो सकते हैं। लेकिन क्या इससे भारतीय उच्च शिक्षा के माहौल में गुणात्मक परिवर्तन होगा? झारखंड के एक विश्वविद्यालय की प्रोफेसर बताती हैं कि वहां अब मनोविज्ञान विषय की पढ़ाई बंद हो गई है, क्योंकि पहले मनोविज्ञान के प्राध्यापक नहीं रहे और फिर छात्रों ने दाखिला लेना बंद कर दिया। अंततः विश्वविद्यालय ने कोर्स से ही मुक्ति पा ली। एक दूसरे कॉलेज की प्राध्यापिका बताती हैं कि उनके यहां बैचलर स्तर के अलग-अलग कोर्स में हिंदी के 3000 विद्यार्थी हैं, लेकिन पढ़ाने वाली बस एक शिक्षिका हैं। ये सूचनाएं किसी अपवाद की तरह नहीं आ रही हैं। एक दौर में तमाम सरकारी विश्वविद्यालयों में अच्छे प्रोफेसर होते थे, सारी अराजकता के बावजूद छात्र पढ़ते थे। वह अराजकता भी उनके व्यक्तित्व निर्माण में कुछ योगदान ही देती थी। वे दुनिया में अपनी विशेषज्ञता के लिए नाम कमाते थे। लेकिन धीरे-धीरे इस तंत्र में जंग लग गई। कुलपति योग्यता नहीं, राजनीतिक अनुकम्पा के आधार पर चुने जाने लगे। अब तो प्राध्यापकों की चयन प्रक्रिया में भी यह कसौटी बताई जाती है कि वे किसी खास विचारधारा के समर्थक हों। कभी कहा जाता था कि विश्वविद्यालय समाज के वे ठिकाने होते हैं, जहां 15-16 साल की उम्र में बहुत सारे संभावित अपराधी दाखिल होते हैं, लेकिन अगले चार-पांच बरस में जिम्मेदार नागरिक बनकर निकलते हैं। इन ठिकानों में उन्हें तमाम विषयों का ज्ञान मिलता था, राजनीतिक समझ मिलती थी, कुछ याद रह जाने लायक प्रोफेसर मिलते थे, कुछ आंदोलनों और कुछ शरारतों की स्मृतियां मिलती थीं और उनके व्यक्तित्व में अगर कोई अतिरिक्त तीक्ष्णता होती थी तो उसे तराशकर मानवीय बनाने का काम होता था। लेकिन अब पढ़ाई एक कारोबार में बदल गई है। अब स्कूलों से बारहवीं पास करके लड़के विश्वविद्यालयों नहीं, तकनीकी संस्थानों में जा रहे हैं, जहां से चार साल में डिग्री लेकर उन्हें एक चमकती हुई नौकरी हासिल करनी है। उन्हें देश, समाज, जीवन के बारे में कुछ नहीं सोचना है, किसी आदर्श के चक्कर में नहीं पड़ना है, बस कोर्स पूरा करना है और कैम्पस सिलेक्शन के जरिए कहीं निकल जाना है। लेकिन पढ़ाई बस इतने के लिए नहीं होती। विश्वविद्यालय बेहतर नागरिक बनाने के कारखाने भी होते हैं। यह नागरिकता रसायन, भौतिकी या गणित से ज्यादा इतिहास, भूगोल, राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र पढ़ कर आती है, जिन्हें आर्ट फैकल्टी या मानविकी संकाय कहा जाता है। सबसे ज्यादा दुर्दशा इसी संकाय की हुई है। यह हमेशा से माना जाता रहा है कि पढ़ने में होशियार बच्चे साइंस लेते हैं, लेकिन यह इन वर्षों में ही हुआ है कि आर्ट्स की पढ़ाई जैसे धूल में मिला दी गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं में आने वाले इतिहास, भूगोल या राजनीति के प्रश्नों के लिए तैयारी कराने का काम अब कोचिंग संस्थानों का है। भारत में स्कूली शिक्षा तो पहले से सामाजिक असमानता का आधार रही, लेकिन अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक भी शैक्षणिक विषमता का यह सिलसिला पहुंच गया है। निजी विश्वविद्यालयों की चमक-दमक तो बहुत है लेकिन वहां न शिक्षकों को पूरे पैसे मिलते हैं और न छात्रों को पूरा ज्ञान। इस अंधकार में जुगनू की तरह आ रहे विदेशी विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के हमारे वास्तविक संकट को कितना हल कर पाएंगे- यह एक बड़ा सवाल है। विश्वविद्यालय बेहतर नागरिक बनाने के कारखाने होते हैं। यह नागरिकता रसायन, भौतिकी या गणित से ज्यादा इतिहास, भूगोल, राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र पढ़ कर आती है, जिन्हें आर्ट फैकल्टी कहा जाता है। पर सबसे ज्यादा दुर्दशा इसी संकाय की हुई है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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