पेड़ भी कुछ कहना चाहते हैं। यह प्रकृति के पक्ष में बोली जाने वाली आदर्श पंक्तियां नहीं, इसके पीछे एक सच काम कर रहा है। 20 से 100 किलोहर्ट्ज पर पेड़-पौधे आवाज करते हैं और इसे दूसरे पेड़ और कुछ जानवर सुनते भी हैं। इसके वैज्ञानिक प्रयोग हो चुके हैं। जैसे शांत पलों में पेड़ कुछ गुनगुनाते हैं। उनके फूल तोड़ने पर वो आहत नहीं होते। अब धीरे-धीरे मनुष्य को चाहिए कि वो पौधों की आवाज सुने और ऐसा हो भी सकेगा। जो मनुष्य अपनी आत्मा पर बहुत अधिक टिकेंगे, आत्मा के निकट होंगे, वो पेड़-पौधों की आवाज सुन सकेंगे। प्रकृति और मनुष्य के बीच जो भावनात्मक संबंध है, वो और बढ़ना चाहिए, वरना मनुष्य से मनुष्य के बीच का भावनात्मक संबंध तो बिगड़ेगा ही। जघन्य अपराध पहले पुरुषों के खाते में ही जाते थे। अब कुछ बहन-बेटियां भी सीमाएं लांघ रही हैं। अपराध हुआ, कानून अपना काम करेगा। लेकिन इसका एक बड़ा नुकसान हुआ कि परिवारों में एक-दूसरे के रिश्ते पर संदेह खड़े हो गए। प्रकृति से हम जितने दूर होंगे, उतने ही हिंसात्मक, आक्रामक और निगेटिव होते जाएंगे।
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:प्रकृति और मनुष्य के बीच भी भावनात्मक संबंध बढ़ें
