हम राष्ट्र का स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। उस समय राष्ट्रवासी का स्वतंत्रता-भाव क्या होना चाहिए, इस पर भी विचार करें। हम देशवासी इस देश की निष्ठावान पैदल-सेना हैं। हम भारतवासियों के यहां एक शब्द और एक रूप है- संन्यास। संन्यासी होने का अर्थ यह है कि परम स्वतंत्र जीवन, लेकिन अनुशासन से बंधा हुआ। संन्यासी घोषणा करता है कि अब तेरे भरोसे का जीवन आरंभ हो गया। यानी जो भी है, ईश्वर के भरोसे है। फिर भी संन्यासी सबसे स्वतंत्र है। स्वतंत्रता दिवस पर हम संन्यास-भाव को अपने भीतर उतारें। संन्यासी एकांत में ईश-रस का पान करता है। जब वह अकेला होता है तब वह भगवान के साथ होता है। तीन रास्ते संन्यासी अपनाता है पूरे अनुशासन के साथ- ज्ञान, कर्म और उपासना। ज्ञान तबले और हारमोनियम की तरह है, भक्ति का मार्ग बांसुरी की तरह है और कर्म एक पूरा ऑर्केस्ट्रा है। हम भी अपने को ऐसा स्वतंत्र करें कि अनुशासनबद्ध हों, नियम से काम करें, लेकिन गुलामी का भाव जाता रहे।
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:स्वतंत्रता दिवस पर संन्यास भाव को अपने भीतर उतारें

