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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:धार्मिक रुझान तो बढ़ा है, आध्यात्मिक जागरण भी हो

बाजार की दुनिया में कहा जाता है कि दुनिया संतानों का अर्थशास्त्र है। इसीलिए बाजार ने बच्चों, युवाओं और महिलाओं को योजनाबद्ध ढंग से अपना उपभोक्ता बनाया और धीरे-धीरे ये उपभोक्ता बाजार का सामान ही बन गए। अब यह सारी बातें परिवार पर जोड़ी जाएं कि परिवार का अर्थशास्त्र संतानों पर टिका है और परिवार का भविष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन्हीं संतानों से चलता है। बाहर की दुनिया में रोबोट धीरे-धीरे हावी हो रहे हैं। रोबोट एक ऐसी वृत्ति है, जो मनुष्य के भीतर की भावनाओं को पी जाएगी। इसके खतरे परिवार में भी दिखेंगे। परिवार में लोग जीते-जागते रहते हुए भी रोबोट की तरह व्यवहार करेंगे। मां-बाप बच्चों को रोबोट जैसा तैयार कर रहे हैं और रोबोट एक दिन इतना निरंकुश हो जाएगा कि वह किसी मनुष्य के वश में नहीं रहेगा। इसका सबसे बड़ा खतरा परिवार में यह देखने को मिलेगा कि आने वाली पीढ़ियां परिवार को बोझ मानेंगी। इसलिए हमारे परिवारों में धार्मिक रुझान तो बढ़ा है, लेकिन आध्यात्मिक जागरण भी होना चाहिए। आत्मा का स्वाद जिस परिवार ने समझा, उसका अर्थशास्त्र बहुत दूरगामी होगा।

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