अपनी ही परछाई देखकर खुश होना समझदारी है। उसे देखकर डर जाना नादानी है, क्योंकि परछाई का अस्तित्व देह से है। पर परछाई को ही देह समझ लें तो माया का प्रवेश हो जाता है। राम जी के माध्यम से तुलसीदास जी ने एक नई फिलॉसफी दी। पंक्ति लिखी- रूप रासि नृप अजिर बिहारी, नाचहिं निज प्रतिबिम्ब निहारी। राजा दशरथ जी के आंगन में विहार करने वाले रूप की राशि श्रीरामचंद्र अपनी परछाई देखकर नाचते हैं। वैसे तो यह बाल-लीला है, लेकिन इसके पीछे एक संदेश है। हम लोग अपना जीवन परछाई देखने में बिता देते हैं। उसे ही सच मान लेते हैं, जो दिख रहा है। लेकिन जीवन में बहुत कुछ अनदेखा है, जो महत्वपूर्ण है। चार लोगों पर नजर रखिएगा। टूरिस्ट केवल समय बिताते हुए देखते हैं। ट्रैवलर खोजते हैं। दर्शनार्थी तीर्थस्थल को देखकर डूब जाते हैं। और एक वर्ग ऐसा भी होता है, जो इन तीनों को देखकर सीख लेता है कि क्या देखना, किसको सत्य मानना है। परछाई पर टिकने की कोशिश न करें, इसके बजाय देह को समझें।
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:परछाई पर टिकने की कोशिश न करें, इसके बजाय देह को समझें

