भारत में निजी अस्पताल में दाखिले के साथ ही मरीज और परिवार के सामने दुविधाएं आ खड़ी होती हैं। अंतिम बिल कितना होगा, यह अकसर इलाज पूरा होने तक स्पष्ट नहीं होता। संसद में 7 अगस्त 2026 को पेश स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 176वीं रिपोर्ट ने इसी चिंता को सामने रखा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार निजी अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च 50,508 रुपये है, जबकि सरकारी अस्पताल में यह 6,631 रुपये है। प्रसव पर निजी संस्थान में औसत जेब खर्च 37,630 रुपये है, जबकि सरकारी संस्थान में केवल 2,299 रुपये। समिति ने कुल 368 सिफारिशें की हैं। इनमें इलाज शुरू होने से पहले संभावित खर्च बताना, मानकीकृत पैकेज दरें तय करना और अस्पतालों के शुल्क में पारदर्शिता बढ़ाना शामिल है। एक सुझाव यह भी है कि महानगरों में निजी अस्पतालों के सामान्य कमरों का शुल्क आसपास के तीन सितारा होटलों के औसत किराये से अधिक न हो। बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों से अपेक्षा की गई है कि मेडिकल टूरिज्म, विदेशी मरीजों और संपन्न वर्ग से होने वाली आय का कुछ लाभ गरीबों तक पहुंचे। लेकिन भारत को स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए निजी और विदेशी पूंजी की जरूरत भी है। अस्पताल बनाना महंगा है। जमीन, आधुनिक उपकरण, आईसीयू, प्रयोगशालाएं, डिजिटल तकनीक और प्रशिक्षित कर्मचारी- सबके लिए बड़ा निवेश चाहिए। सरकारी अस्पताल अभी अकेले देश की सारी जरूरत पूरी नहीं कर सकते। इसलिए निजी अस्पतालों और विदेशी निवेश को खलनायक मानना सही नहीं होगा। समस्या पूंजी नहीं, यह है कि पूंजी से मिलने वाले लाभ की अपेक्षा कहीं चिकित्सा निर्णयों को प्रभावित न करने लगे। स्वास्थ्य-सेवा सामान्य बाजार नहीं है। बीमार व्यक्ति कार या मोबाइल खरीदने वाले ग्राहक की तरह अलग-अलग दुकानों में कीमतों की तुलना नहीं कर सकता। अस्पताल ही काफी हद तक तय करता है कि मरीज का क्या इलाज करना है। एमआरआई जरूरी है या नहीं, भर्ती दो दिन और चले या नहीं, एंजियोप्लास्टी की आवश्यकता है या दवाओं से इलाज हो सकता है- इन फैसलों में डॉक्टर और अस्पताल के पास मरीज से कहीं अधिक जानकारी होती है। यह स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ी इन्फॉर्मेशन एसीमेट्री या ज्ञान-असमानता है, जिसके बारे में अर्थशास्त्री लम्बे समय से बताते रहे हैं। कॉर्पोरेट अस्पतालों में महंगी तकनीक, नामी विशेषज्ञ और बेहतर सुविधाएं गुणवत्ता बढ़ा सकती हैं। लेकिन इनकी लागत भी वसूलनी होती है। संस्थानों पर लगातार बेड भरने, प्रति मरीज आय बढ़ाने या अधिक जांचें कराने का दबाव होता है। अधिकांश डॉक्टर मरीज का हित ही चाहते हैं, लेकिन संस्थागत प्रोत्साहन चिकित्सकीय व्यवहार को प्रभावित करते हैं। यहीं से ‘ओवर-मेडिकलाइजेशन’ की समस्या शुरू होती है। अधिक जांचें ऐसी छोटी असामान्यताएं पकड़ सकती हैं जिनसे मरीज को जीवनभर कोई नुकसान नहीं होता। फिर उनके पीछे नई जांचें होती हैं। सामान्य सीमा के आसपास की स्थिति बीमारी घोषित हो सकती है। जिसे घर पर दवाओं व निगरानी से संभाला जा सकता था, वह अस्पताल में भर्ती हो सकता है। जहां इंतजार और निगरानी उचित थी, वहां प्रक्रिया की सलाह दी जा सकती है। सीजेरियन ऑपरेशन, एंजियोप्लास्टी, आईसीयू भर्ती, डायग्नोस्टिक पैकेज और लंबी दवा-सूचियों पर इसलिए केवल व्यक्तिगत चिकित्सकीय फैसलों के रूप में नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य-तंत्र के प्रोत्साहनों के संदर्भ में भी विचार होना चाहिए। हमें स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश चाहिए। मुनाफा कमाना भी अपराध नहीं है। सीमा वहां खिंचनी चाहिए, जहां मुनाफे की अपेक्षा यह तय करने लगे कि कौन-सी जांच होगी, कौन-सी दवा लिखी जाएगी और कौन-सी प्रक्रिया की जाएगी। स्वास्थ्य-व्यवस्था की सफलता अस्पतालों में आए निवेश या मेडिकल टूरिज्म की वृद्धि से नहीं मापी जानी चाहिए। असली कसौटी यह है कि मरीज अस्पताल में इस भरोसे से प्रवेश कर सके कि उसे उतना ही इलाज मिलेगा, जितना जरूरी है- न उससे कम, न अधिक। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:मुनाफा तय न करे कि कौन-सी जांच हो और कौन-सी दवा दें

