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ज्यां द्रेज का कॉलम:99% आबादी की समस्याओं को 1% “सुपर-रिच’ हल कर सकते हैं

हाल ही में पेरिस स्थित वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की, जिसका नाम ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट है। वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब एक शोध-समूह है, जिसका नेतृत्व प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी करते हैं। इस रिपोर्ट में आज दुनिया के सामने मौजूद दो गंभीर संकटों- जलवायु परिवर्तन और आर्थिक विषमता से निपटने की बात की गई है। जलवायु परिवर्तन तो हमारे अस्तित्व के लिए ही एक गंभीर खतरा है। पृथ्वी हर साल गर्म होती जा रही है। औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में पृथ्वी का तापमान अब तक 1.5 डिग्री बढ़ चुका है। गर्मी बढ़ने की मौजूदा गति से यह जल्द ही 3 डिग्री तक पहुंच सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो तापमान 5 डिग्री या उससे भी ज्यादा बढ़ सकता है। तब भारत में बिहार और यूपी जैसे इलाकों में जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगा। ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बंद करके उनकी जगह पवन और सौर ऊर्जा को अपनाना होगा। यह संभव है, लेकिन इसके लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। अमीर और गरीब देश इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं कि इसका खर्च किस तरह बांटा जाए। दुनिया के सामने एक और बड़ा संकट आर्थिक असमानता का बढ़ना है। एक छोटा-सा वर्ग बेहद अमीर हो गया है और उसकी संपत्ति हर साल बढ़ती जा रही है। दुनिया में लगभग 3,000 लोगों के पास एक अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति है। यह बहुत बड़ी रकम होती है- लगभग 10,000 करोड़ रुपए। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति इलॉन मस्क की संपत्ति तो ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गई है। यह 100 लाख करोड़ रु. के बराबर है। अत्यधिक केंद्रित धन लोकतंत्र के लिए एक खतरा है। अति-अमीर लोग मीडिया, राजनीतिक दलों, चुनावी नतीजों और सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं। जब सरकारी नीतियों पर उनकी पकड़ होती है, तो वे उन्हें अपने फायदे के हिसाब से मोड़ देते हैं। वे प्राकृतिक संसाधनों से मुनाफा कमाने के लिए पर्यावरण संबंधी नियमों को कमजोर करते हैं। यह प्रक्रिया अमेरिका में साफ दिखाई देती है। भारत भी उसी दिशा में बढ़ रहा है। ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट इन दोनों संकटों- ग्लोबल वार्मिंग और आर्थिक असमानता से बचने की योजना पेश करती है। इस योजना का मुख्य आधार एक ग्लोबल जस्टिस फंड है, जिसे वैश्विक धन-कर (ग्लोबल वेल्थ टैक्स) से वित्तपोषित किया जाएगा। इसके तहत 20 लाख डॉलर से अधिक संपत्ति वाले हर व्यक्ति को धन-कर देना होगा। यह 1% प्रति वर्ष से शुरू होगा और धीरे-धीरे बढ़कर उन लोगों के लिए 20% तक पहुंच जाएगा, जिनकी संपत्ति 50 करोड़ डॉलर से अधिक है। ग्लोबल जस्टिस फंड का उपयोग इस तरह किया जाएगा कि दुनिया के सभी देश 2100 तक नई आर्थिक व्यवस्था तक पहुंच सकें। इस व्यवस्था में सभी देशों की प्रति व्यक्ति आय आज के अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय के आसपास होगी। काम के घंटे घटाकर रोज केवल तीन या चार घंटे कर दिए जाएंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बहुत बड़ा विस्तार होगा। और ऊर्जा परिवर्तन की मदद से ग्लोबल वार्मिंग का अंत हो जाएगा। चौंकाने वाली बात है कि 1% से भी कम आबादी वाले अति-अमीर लोगों पर कर लगाकर इतना बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। कई लोग कहेंगे कि इसे राजनीतिक रूप से लागू करना संभव नहीं है। लेकिन अगर यह योजना दुनिया की 99% आबादी के लिए फायदेमंद है, तो इसे राजनीतिक रूप से लागू करना मुश्किल क्यों है? कारण, बाकी 1% लोग बहुत प्रभावशाली हैं। वे वैश्विक धन कर को लागू नहीं होने देंगे। यही आज की दुनिया में लोकतंत्र की स्थिति है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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