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कौशिक बसु का कॉलम:बहुत सारे फैसले ऐसे हैं, जिनके लिए विशेषज्ञ की राय जरूरी है

भारत सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार और विश्व बैंक में चीफ इकोनॉमिस्ट के रूप में वर्षों तक काम करते हुए मुझे यह समझ में आया कि अर्थशास्त्र कितना विचित्र विषय है। अर्थशास्त्र का औपचारिक प्रशिक्षण न रखने वाले नेता भी कभी-कभी ऐसे नीतिगत निर्णय ले लेते हैं, जो पेशेवर विशेषज्ञों के निर्णयों जितने ही उचित होते हैं। लेकिन इसके कुछ आयाम ऐसे भी हैं, जो इंजीनियरिंग जितने सटीक होते हैं। इन क्षेत्रों में यदि बिना विशेषज्ञों की सहायता के नीतिगत निर्णय लें, तो यह वैसा ही होता है, जैसे किसी अकाउंटेंट से किसी पुल का डिजाइन तैयार करने को कहा जाए। कई गंभीर भूलें तब होती हैं, जब राजनीतिक नेतृत्व ऐसे क्षेत्रों में कदम रखता है, जहां विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। नोटबंदी इसका उल्लेखनीय उदाहरण था। टैरिफों को बार्गेनिंग के उपकरण के रूप में उपयोग करने की ट्रम्प की शैली इसका एक और उदाहरण है। यदि टैरिफ कम हों, तो कंपनियां क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड पर आधारित बिजनेस में निवेश करेंगी। यदि टैरिफ अधिक हों, तो वे घरेलू उत्पादन में निवेश करेंगी। लेकिन जब टैरिफों की बार-बार घोषणा की जाए, उन्हें स्थगित किया जाए, उन पर दोबारा बातचीत की जाए, उनमें छूट दी जाए और दूसरे देशों से रियायतें हासिल करने या उन्हें दंडित करने के राजनीतिक हथियार के रूप में उन्हें आगे बढ़ाया जाए, तो कंपनियां दोनों में से किसी भी क्षेत्र में निवेश करने से हिचकने लगती हैं। इस नीतिगत अनिश्चितता की कीमत अमेरिका ने अधिक महंगाई और धीमी आर्थिक वृद्धि के रूप में चुकाई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के तहत भारत सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मैंने नीलामी-प्रक्रिया के महत्व को भी देखा। 2010 में, सरकार 3जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस बेचने की तैयारी कर रही थी, जिसके बारे में अधिकारियों का अनुमान था कि इससे 7 अरब डॉलर मिलेंगे। मैंने सिफारिश की कि पारम्परिक प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर रहने के बजाय सरकार एक पेशेवर रूप से डिजाइन की गई नीलामी को लाइसेंसों का बाजार-मूल्य तय करने दे। मनमोहन सिंह स्वयं एक प्रशिक्षण-प्राप्त अर्थशास्त्री थे, वे इस बात से सहमत हो गए। नीलामी से अंततः लगभग 15 अरब डॉलर जुटाए गए। यदि स्पेक्ट्रम को पारम्परिक प्रक्रिया के जरिए आवंटित किया गया होता, तो सरकार लगभग 8 अरब डॉलर गंवा देती और यह पैसा निजी फर्मों के पास चला जाता। भ्रष्टाचार-रोधी नीति भी ऐसा क्षेत्र है, जहां आर्थिक विशेषज्ञता अपरिहार्य है। भ्रष्टाचार लंबे समय से भारत के लिए भी एक गंभीर समस्या रहा है। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन के आरोप यह दर्शाते हैं कि देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाएं भी इससे अछूती नहीं हैं। स्वाभाविक है कि भारतीय चाहते हैं कि भ्रष्ट अधिकारियों को न्याय के कठघरे में लाया जाए, लेकिन भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल नैतिक उपदेश या कठोर दंड पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रोत्साहनों, बाजारों और संस्थागत ढांचे की समझ भी जरूरी है। 1950 के दशक की शुरुआत में ताइवान का अनुभव इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अन्य देशों के व्यापारियों की तरह ताइवान के कारोबारी भी कर चोरी के लिए अकसर अपनी बिक्री का पूरा रिकॉर्ड दर्ज नहीं करते थे। इससे निपटने के लिए ताइवान ने 1951 में यूनिफॉर्म इनवॉइस लॉटरी शुरू की। चिंग राजवंश के समय से प्रचलित आधिकारिक रिकॉर्ड की परम्परा से प्रेरणा लेते हुए प्रत्येक आधिकारिक ग्राहक-रसीद को नियमित नकद पुरस्कार वाली लॉटरी का टिकट बना दिया गया। इस व्यवस्था ने लाखों लोगों को रसीद मांगने का व्यक्तिगत प्रोत्साहन दिया, जिससे वे कर-प्रवर्तन की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन गए। इसके परिणाम उल्लेखनीय रहे। कारोबारी केवल रसीद जारी न करके कर चोरी नहीं कर सकते थे, क्योंकि अब ग्राहकों के पास रसीद लेने का मजबूत प्रोत्साहन था। एक वर्ष के भीतर ही ताइवान में कर राजस्व 75% बढ़ गया। जैसे-जैसे राजनीति उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने लगी है, जहां तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, वैसे-वैसे आर्थिक भूलों का जोखिम भी बढ़ता गया है। यदि अतीत की भूलों से कोई सीख मिलती है, तो वो यह है कि राजनीतिक इंस्टिक्ट्स कठोर आर्थिक विश्लेषण का विकल्प नहीं हो सकतीं। जैसे-जैसे राजनीति उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने लगती है, जहां तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है, वैसे-वैसे आर्थिक भूलों का जोखिम भी बढ़ता जाता है। राजनीतिक इंस्टिक्ट्स कठोर आर्थिक विश्लेषण का विकल्प नहीं हो सकतीं।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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