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कार्ल बेनेडिक्ट फ्रे का कॉलम:हम केवल आमदनी के लिए ही कोई काम नहीं करते हैं

कर्ट वोनेगट ने अपने उपन्यास ‘प्लेयर पियानो’ (1952) में एक ऐसी दुनिया की कल्पना की थी, जहां मशीनों ने अधिकांश उद्योगों को ऑटोमैट कर दिया है और केवल कुछ इंजीनियर तथा मैनेजर ही व्यवस्था की निगरानी के लिए बचे हैं। बाकी सभी लोगों के भोजन और आवास की व्यवस्था सरकार करती है, लेकिन उनके पास करने के लिए कोई काम नहीं है। क्या वोनेगट की यह कल्पना दूरदर्शी सिद्ध हुई है? यह कहना तो अभी संभव नहीं है कि एआई हमारी वर्कफोर्स के एक बड़े हिस्से को अनावश्यक बना देगा। लेकिन इतना हम जरूर जानते हैं कि एआई मनुष्य-जीवन के मायनों के सामने गम्भीर चुनौतियां प्रस्तुत करने लगा है। यदि हमारे अधिकांश काम ऑटोमैट हो जाते हैं, तो औसतन हम अधिक समृद्ध होंगे। इससे संतोष का स्तर बढ़ना चाहिए। अलबत्ता शोध बताते हैं कि जब आपकी आय दोगुनी हो जाती है तो जीवन का मूल्यांकन करने के आपके पैमाने भी उतनी ही मात्रा में कठोर हो जाते हैं। लेकिन जीवन के कोई मायने होना एक अलग विषय है। हम जो काम करते हैं, उससे हमें केवल आमदनी ही नहीं मिलती, वह हमारी पहचान का भी एक हिस्सा होता है। दूसरी तरफ, अगर हमारे पास करने को कुछ न हो तो यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, फिर भले ही हमें पूरी आमदनी मिल रही हो। वेतन के साथ-साथ काम व्यक्ति को जीवन में अनुशासन, लगाव की भावना, सामाजिक प्रतिष्ठा और किसी उद्देश्य में योगदान देने का एहसास भी देता है। इन गुणों का री-डिस्ट्रीब्यूशन पैसों की तरह नहीं किया जा सकता। वास्तव में, एआई कम से कम तीन तरीकों से जीवन के मायनों के लिए चुनौती उत्पन्न करता है। आपके उद्देश्य-बोध को कमजोर करने के लिए एआई का आपसे बेहतर होना आवश्यक नहीं है; उसका केवल ‘फंक्शनल’ तरीके से ठीक-ठाक और कम लागत वाला होना ही पर्याप्त है। जब हम किसी असाधारण चीज से पीछे रह जाते हैं तो वो अलग बात है; लेकिन किसी ऐसी चीज द्वारा अप्रासंगिक बना दिया जाना- जो केवल ‘गुड-इनफ’ हो- बिल्कुल दूसरी बात है। इसके अलावा, एआई-संचालित मनोरंजन और ‘कम्पैनियनशिप’ (एआई को दोस्त समझकर उसी के साथ समय बिताते रहना) लोगों के समय और सामाजिक जुड़ाव की जरूरत के बड़े हिस्से को अपने कब्जे में ले सकते हैं। वे उन अधिक चुनौतीपूर्ण गतिविधियों का स्थान भी ले सकते हैं, जिनसे जीवन में मायनों का निर्माण होता है। सहज और निर्बाध निकटता का अनुभव उपलब्ध कराकर एआई उन प्रयासों, कर्तव्यों, पारस्परिकता, निःस्वार्थता और असुविधाओं को पीछे धकेल सकता है, जिनकी वास्तविक संबंधों को आवश्यकता होती है। एआई के साथ संबंध हमसे बदले में कुछ भी नहीं मांगता। वास्तव में वह संबंध के रूप में प्रस्तुत किया गया उपभोग मात्र है। डिजिटल-जीवन पहले ही मानवीय संबंधों को बदल चुका है। युवाओं में सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग जीवन में संतुष्टि की भावना के घटते चले जाने से जुड़ा पाया गया है। इसमें अभी तक एआई की भूमिका नहीं है, लेकिन इससे इतना तो पता चलता ही है कि डिजिटल माध्यमों से अधिक संपर्क मानवीय संबंधों में अधिक गहराई नहीं लाता। सच तो यह है कि जीवन में मायनों की तलाश शायद ही कभी कम्फर्ट की स्थिति से होती है। वह किसी चुने हुए उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयासों से ही होती है, चाहे वह अपने बच्चे का पालन-पोषण हो या किसी स्किल में महारत हासिल करना। जीवन में पीछे मुड़कर देखने पर लोग किसी सार्थक लक्ष्य के लिए किए गए संघर्ष को ही अधिक मूल्यवान मानते हैं। संभवतः यही कारण है कि अधिक समृद्ध और विकसित समाज अधिक सुविधा तो अनुभव करते हैं, लेकिन जीवन के उद्देश्यों का अधिक गहरा बोध उन्हें नहीं हो पाता। यह भी याद रखें कि अगर एआई मानवीय क्षमताओं से आगे निकल जाए, तब भी हर प्रकार का काम समाप्त नहीं होगा। कंप्यूटरों के शतरंज में मनुष्यों से बेहतर हो जाने के बाद भी लोगों ने शतरंज खेलना बंद नहीं किया है। लोग आज भी दौड़ते हैं, भोजन पकाते हैं, संगीत रचते हैं, फर्नीचर बनाते हैं और लाइव-परफॉर्मेंस को महंगे टिकट खरीदकर देखते हैं। जीवन में मायनों की तलाश शायद ही कभी कम्फर्ट की स्थिति से होती है। वह किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयासों से ही होती है, चाहे वह बच्चे की परवरिश हो या किसी स्किल में महारत हासिल करना। लोग किसी लक्ष्य के लिए किए गए संघर्ष को ही मूल्यवान मानते हैं।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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