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एन. रघुरामन का कॉलम:हर पैरेंट को ये दो कहानियां अपने बच्चों को जरूर सुनानी चाहिए

इन दोनों की कहानियों की शुरुआत अलग-अलग है, लेकिन अंत असाधारण है। उनकी कहानियां अमेरिका के फ्लोरिडा और भारत के लखनऊ में हजारों किलोमीटर की दूरी पर शुरू हुईं। नैथन थॉमस की कहानी फ्लोरिडा से तो दीप्ति कन्नौजिया की लखनऊ में एक कमरे के घर से शुरू हुई। नैथन गणितीय समीकरणों के बीच पले-बढ़े, दीप्ति अनिश्चितताओं में बड़ी हुईं। नैथन 19वें जन्मदिन से पहले दुनिया के सबसे कम उम्र के पुरुष प्रोफेसर बने, जबकि दीप्ति ने 14वें जन्मदिन से पहले अपने पैरेंट्स को खो दिया। फिर भी, उन्होंने सिंगापुर में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति हासिल की। नैथन इंजीनियरों के परिवार से आते हैं। उनकी मां में मुश्किल सवालों को भी आसानी से समझाने की अद्भुत क्षमता है। इसीलिए नैथन उन बच्चों में से थे, जो उन गणितीय सवालों को भी एंजॉय करते थे, जिनसे बड़े लोग तक घबरा जाते थे। जब ज्यादातर बच्चे मिडिल स्कूल में दाखिल होते थे, तब नैथन ने ड्यूल एनरोलमेंट प्रोग्राम के जरिए महज 10 साल की उम्र में कॉलेज में दाखिला ले लिया। जिस उम्र में ज्यादातर टीनएजर्स यह तय कर रहे होते हैं कि उन्हें किस क्षेत्र में कॅरिअर बनाना है, नैथन ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, ऑनर्स में अपनी बैचलर और मास्टर्स डिग्री पूरी कर लीं। हाल ही में, 18 साल, 346 दिन की उम्र में उन्होंने मियामी डेड कॉलेज में इंजीनियरिंग के टीचर का पद संभाला और दुनिया के सबसे कम उम्र के प्रोफेसर बने। उन्होंने स्कॉटलैंड के गणितज्ञ कॉलिन मैकलॉरिन का 2008 का रिकॉर्ड तोड़ दिया, जो 19 साल की उम्र में प्रोफेसर बने थे। जब नैथन से इस रिकॉर्ड के बारे में पूछा गया तो उन्होंने प्रसिद्धि या पहचान की बात नहीं की, बल्कि उन्होंने कहा कि वे टीचिंग को सर्वाधिक एंजॉय करते हैं। उन्होंने कहा, जब किसी स्टूडेंट को कोई कठिन कॉन्सेप्ट अचानक से समझ आ जाए तो उसके चेहरे पर जो खुशी आती है, उसे देखना उनका सबसे पसंदीदा पल होता है। उनके लिए सफलता का पैमाना यह नहीं कि वह कितना जानते हैं, बल्कि यह है कि उनकी वजह से कोई दूसरा कितना सीख पाया। अब लखनऊ चलते हैं, जहां एक टीनएजर की जिंदगी बेहद कठिनाइयों में बीती। 13 की उम्र में दीप्ति अनाथ हो गईं। ऐसी त्रासदी बहुत-से लोगों के सपनों का अंत कर सकती थी। लेकिन दीप्ति के लिए यह एक नई यात्रा की शुरुआत बनी। उन्होंने प्रेरणा गर्ल्स स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी लगन से जारी रखी। एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज में भी हिस्सा लिया और धीरे-धीरे आत्मविश्वास वापस हासिल किया। सबसे अहम, उन्होंने शिक्षकों द्वारा कही गई ऐसी बातों पर भरोसा किया, जिन पर खुद उन्हें ही भरोसा नहीं था। वह यह कि हालात उनका भविष्य तय नहीं करते। पिछले साल उन्होंने यूनाइटेड वर्ल्ड कॉलेजेस मूवमेंट की ओर से दी जाने वाली दुनिया की सबसे प्रतिस्पर्धी एजुकेशनल स्कॉलरशिप्स में से एक के लिए आवेदन किया। चयन प्रक्रिया में एकेडमिक एक्सीलेंस, लीडरशिप, विचारों की मजबूती, समाज सेवा और सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता जैसे गुणों को परखा गया। कई महीनों बाद जवाब आया। दीप्ति का चयन पूर्ण स्कॉलरशिप पर सिंगापुर के यूनाइटेड वर्ल्ड कॉलेज साउथ ईस्ट एशिया में इंटरनेशनल बैकलॉरिएट डिप्लोमा प्रोग्राम की पढ़ाई के लिए हो गया। पैरेंट्स आपसे दुनिया का सबसे कम उम्र का प्रोफेसर बनने या अंतरराष्ट्रीय स्कॉलरशिप हासिल करने की उम्मीद नहीं रखते। रिकॉर्ड तो हर दिन टूटते हैं और गिने-चुने लोग स्कॉलरशिप भी हासिल कर लेते हैं। मैं तो इससे कहीं ज्यादा मूल्यवान चीज आपके लिए चाहता हूं- सीखने से जीवन भर प्रेम करते रहें। अगर आप जिज्ञासु बने रहेंगे, बिना डर सवाल पूछेंगे, दूसरों से ज्यादा पढ़ेंगे, तब भी अभ्यास करेंगे जब कोई देख नहीं रहा हो और निराशाओं के बाद भी बढ़ते रहेंगे तो सफलता अंतत: आपके पीछे आएगी। जिंदगी ऐसी दौड़ नहीं, जहां हर कोई एक ही लाइन से शुरुआत करता है। यह ऐसी यात्रा है, जिसमें अकसर वही जीतते हैं, जो चलना बंद नहीं करते। जब भी आपको लगे कि कोई काम बहुत कठिन है तो नैथन को याद करना। जब लगे कि जिंदगी अन्याय कर रही है तो दीप्ति को याद करना। एक ने साबित किया कि उम्र कोई बाधा नहीं होती। दूसरे ने साबित किया कि कठिनाइयां भी रुकावट नहीं होतीं। सच में मायने रखने वाली बाधा तो वही है, जो हम अपने भीतर बना लेते हैं। खुद पर भरोसा कीजिए। हर दिन सीखिए। दयालु और विनम्र बने रहिए। और आगे बढ़ना कभी मत छोड़िए।

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