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एन. रघुरामन का कॉलम:हर दिन संडे जैसा एहसास- “पीक जेन’ को कैसे हासिल करें?

रविवार की एक शांत सुबह की कल्पना कीजिए। आसमान में बादल छाए हैं, खिड़की पर हल्की फुहार दस्तक दे रही है और मौसम बिल्कुल सुहावना है। कोई जल्दी नहीं है, तैयार होने का कोई दबाव नहीं है और ऑफिस नहीं जाना है। आप अपने जीवनसाथी के साथ चुपचाप बैठे हैं- एक हाथ में चाय, दूसरे में सुबह का अखबार। तभी ठंडी हवा का एक झोंका आपके गाल को छूता है और आप दोनों अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। बिना किसी योजना के आप पूर्ण निस्तब्धता की अवस्था में पहुंच जाते हैं। दुनिया जैसे ओझल हो जाती है। आपकी चाय ठंडी हो रही है, लेकिन आपको उसकी परवाह नहीं। आप पूरी तरह संतुष्ट हैं। जब अंततः आप अपनी आंखें खोलते हैं, तो आपमें से कोई एक धीमे से कहता है, “क्या परफेक्ट संडे है’। दूसरा बस सहमति में सिर हिला देता है। हम अपना पूरा जीवन ठीक उसी अनुभूति की तलाश में बिताते हैं। लेकिन वह क्षण इतना परिपूर्ण क्यों था? ऐसा इसलिए नहीं था कि आपके घर का कर्ज चुक गया था, या अभी-अभी आपका वेतन बैंक खाते में आया था। यह इसलिए भी नहीं था कि वह सप्ताहांत था। वह क्षण इसलिए परिपूर्ण था क्योंकि कुछ इत्मीनान भरे मिनटों के लिए आपका ध्यान केवल एक चीज पर केंद्रित था- आपकी सांस। अपनी गति धीमी करके आपने अपने मस्तिष्क को उसके “फाइट-ऑर-फ्लाइट’ मोड से बाहर निकाल दिया था और अपने पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम- शरीर के स्वाभाविक “रेस्ट-एंड-डाइजेस्ट’ रिस्पॉन्स को सक्रिय कर दिया था। आपने अपने मस्तिष्क को यह संकेत दिया कि आप सुरक्षित हैं, जिससे वर्षों से जमा तनाव पिघलने लगा।इसे स्थिरता का विज्ञान कहते हैं। उन कुछ शांत मिनटों में आपके शरीर के भीतर एक अद्भुत जैविक परिवर्तन हुआ था। आपकी हृदय गति धीमी हो गई थी। रक्तचाप कम हो गया था। तनाव का प्रमुख हार्मोन कॉर्टिसोल तेजी से घट गया था। मस्तिष्क का भावनात्मक फियर-सेंटर अमिग्डाला शांत हो गया था। वहीं तर्कसंगत सोच और भावनात्मक संतुलन को नियंत्रित करने वाला प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय हो उठा था। हमारे पूर्वज इस अवस्था को प्रतिदिन साधते थे और इसे ध्यान कहते थे। आज आधुनिक वैज्ञानिक इसे “पीक जेन’ कहते हैं- गहन रिलैक्सेशन, मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन की सर्वोच्च अवस्था। आखिर “पीक जेन’ या ध्यान क्या है? हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में एनेस्थिसियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. बाला सुब्रमण्यम- जिनका काम प्राचीन ध्यान-विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा को जोड़ता है- इसके बारे में सरल शब्दों में कहते हैं : “ध्यान का लक्ष्य उस अवस्था में पहुंचना है, जहां आप अपने विचारों को आते-जाते हुए देखते हैं, लेकिन उनमें उलझते नहीं हैं।’ ध्यान का अर्थ मन को जबरन खाली करना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी मानसिक उथल-पुथल के सहभागी होने से हटकर उसका निष्पक्ष साक्षी बन जाना। जब आप मौन में बैठते हैं, तो आपका मन धीमा पड़ने लगता है। इससे एक ऐसी प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे वैज्ञानिक “टाइम-डाइलेशन’ कहते हैं। यह ठीक उसी “फ्लो-स्टेट’ के जैसा है, जिसका अनुभव शीर्ष स्तर के खिलाड़ी करते हैं। विश्व कप में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खिलाड़ियों की कल्पना कीजिए। गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुंचाने से ठीक एक क्षण पहले दर्शकों से खचाखच भरा स्टेडियम उनके लिए मानो पूरी तरह से विलुप्त हो जाता है। कोलाहल समाप्त हो जाता है। समय जैसे फैलने लगता है। उन्हें रक्षा-पंक्ति में एक छोटा-सा खाली स्थान दिखाई देता है, और वे शॉट लगा देते हैं। ध्यान भी आपको सीधे वैसी ही हाइपर-फोकस्ड स्पष्टता वाली अवस्था में ले जाता है, जहां बाहरी दुनिया का शोर धीमा पड़ जाता है, ताकि आप अपनी आंतरिक मेधा तक पहुंच सकें। इसीलिए, स्थिरता उत्पादकता का सबसे प्रभावी उपाय है। मन में चल रहे शोरगुल को शांत करने का रोजमर्रा का अभ्यास मस्तिष्क की प्राकृतिक न्यूरोप्लास्टिसिटी का उपयोग करते हुए आपके न्यूरल-पाथवेज़ को पूरी तरह से प्रसन्नता के लिए री-वायर कर देता है। आपके मन के लिए यह स्मरण शक्ति को तीक्ष्ण करता है, गहरी एकाग्रता बढ़ाता है और रोजमर्रा की हताशाओं का सामना करने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से आपको मजबूत बनाता है। वहीं आपके शरीर के लिए यह दीर्घकालिक इंफ्लैमेशन को कम करता है, प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाता है और नींद की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाता है। फंडा यह है कि ध्यान वास्तव में आपका समय नहीं लेता। बल्कि यह आपके लिए समय बचाता है। यह मन में लगातार चलते रहने वाले कोलाहल को शांत कर देता है, जिससे आप अधिक सजग, अधिक शांत और पूरी तरह वर्तमान में उपस्थित रहते हैं। हर दिन संडे वाली फीलिंग ऐसे ही मिलती है।

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