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एन. रघुरामन का कॉलम:लोगों के दिमाग में आप कैसे ‘अनफॉर्गेटेबल’ बन सकते हैं?

रामायण में वर्णित निषादराज गुह से कौन-कौन प्रेरणा ले सकता है, जिन्होंने बिना किसी अपेक्षा के लोगों को नदी पार कराई? आधुनिक दौर में जरूरी नहीं कि कोई गुह जैसा नाविक ही बने। वे पुल भी बना सकते हैं। यदि वे ऐसा करते हैं तो लोगों को नदी के एक किनारे से दूसरे तक ही नहीं पहुंचाते, बल्कि किसान की पैदावार को भी नजदीकी बाजार तक पहुंचाते हैं, ताकि वह परिवार को सहयोग कर सके, कोई छात्र अगले गांव के स्कूल जा सके और किसी प्रैग्नेंट महिला को बेहतर मेडिकल केयर मिल सके। यही काम पद्मश्री गिरीश भारद्वाज ने किया था। 1989 में बेंगलुरु से 300 किमी दूर उनके जन्मस्थान अलेट्टी गांव के लोग उनके पास आए और अगले गांव तक पुल बनाने का अनोखा-सा अनुरोध किया। बचपन में भारद्वाज को सीधे पांचवीं कक्षा में एडमिशन लेना पड़ा था, क्योंकि कोई बच्चा इतना लंबा पैदल चल कर नदी पार नहीं कर सकता था। संभवत: उन्हें गुह की याद भी आई होगी। भारद्वाज ने कहा, ‘मैंने कभी पुल नहीं बनाया।’ फिर भी ग्रामीण बोले कि ‘आप इंजीनियर हैं, हल निकाल लेंगे।’ और तब उन्होंने चुनौती स्वीकार ली। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री, सामुदायिक भागीदारी और सरल इंजीनियरिंग सिद्धांतों का इस्तेमाल करके उन्होंने कम खर्च में ही पुल बना दिया। ये खबर नदी से भी तेज गति से फैली। जल्द ही देशभर से सरकारें और समुदाय उन्हें बुलाने लगे। भारत के ‘ब्रिज मैन’ नाम से मशहूर भारद्वाज का इस मंगलवार को 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लेकिन ग्रामीण भारत में उनके बनाए 140 से अधिक सस्पेंशन पुल आज भी इंजीनियरिंग से अधिक बड़ी कहानी सुनाते हैं। वे याद दिलाते हैं कि जब आप किसी व्यापक समस्या को हल करते हैं तो पहचान अपने-आप पीछे आती है। भारत का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। ई. श्रीधरन को लें, जिन्होंने लाखों लोगों को वह चीज दी, जो सबसे ताकतवर लोग भी नहीं दे सकते- समय। उन्होंने समझा कि भारत के तेजी से बढ़ते शहरों को शानदार इंफ्रास्ट्रक्टर से ज्यादा कुशल सार्वजनिक परिवहन की जरूरत है। कोंकण रेलवे और दिल्ली मेट्रो जैसी परियोजनाओं को असाधारण गति और ईमानदारी के साथ पूरा करके उन्होंने शहरी यातायात की तस्वीर बदल दी। आज लाखों लोग ट्रैफिक में कम फंसते हैं, सुरक्षित यात्रा करते हैं और बेहतर जीवन का अनुभव करते हैं, क्योंकि एक इंजीनियर ने परिवहन समस्या के समाधान पर ध्यान दिया। ऐसे लोगों की सूची बहुत लंबी है। डॉ. वर्गीज कुरियन ने दुग्ध क्रांति का जनक बनने का लक्ष्य नहीं रखा था। उन्होंने महज ग्रामीण भारत की एक बड़ी समस्या का समाधान किया कि डेयरी किसानों को उपज का उचित मूल्य मिले। लाखों लोगों को इसका लाभ मिला और सम्मान अपने-आप मिला। डॉ. बिंदेश्वर पाठक पुरस्कारों के पीछे नहीं दौड़े। उन्होंने सुलभ शौचालयों के जरिए स्वच्छता संकट का समाधान किया। लाखों लोगों को सम्मानजनक जीवन दिया और सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति देश की सोच बदली। अरुणाचलम मुरुगनाथम ने भी कभी नहीं सोचा कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलेगी। उन्होंने एक उपेक्षित समस्या पर ध्यान दिया- ग्रामीण महिलाओं को सस्ते सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना। उनके नवाचार ने अनगिनत परिवारों के स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका को बदल दिया। और इस सूची में राजेंद्र सिंह भी हैं, जिन्हें भारत का वाटरमैन कहते हैं। उन्होंने समझा कि पानी की किल्लत गांवों और लोगों की आजीविका को तबाह कर रही है। केवल बड़े बांधों पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों को पुनर्जीवित किया और नदियों व भूजलस्तर को बहाल करने के लिए समुदायों को एकजुट किया। उनके प्रयासों ने राजस्थान के हजारों गांवों में नई जान फूंक दी। उन्होंने साबित किया कि जब स्थानीय लोग पर्यावरणीय चुनौतियों को हल करने में साझेदार बन जाएं तो टिकाऊ विकास सफल होता है। इन सभी उदाहरणों में एक सिद्धांत समान दिखाई देता है- लाखों लोगों को प्रभावित करने वाली समस्या को पहचानो और समाधान के लिए खुद को समर्पित कर दो। जब कोई टीचर बच्चों को शिक्षा से, कोई डॉक्टर गांव को हेल्थकेयर से, कोई आंत्रप्रेन्योर किसानों को बाजार से, कोई इंजीनियर तकनीक को आमजन से, या कोई व्यक्ति उम्मीद को अवसर से जोड़ता है तो दुनिया हमेशा याद रखती है कि किसने सबसे ज्यादा लोगों के जीवन को बेहतर बनाया। फंडा यह है कि जब कोई व्यक्ति कोई बेहद जरूरी पुल बनाता है तो लोग उसके पेशे को भले भूल जाएं, लेकिन उसे बहुत लंबे समय तक याद रखते हैं।

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