उत्तराखंड के चमोली जिले के पीपलकोटी में निर्माणाधीन हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट की टनल में हाल ही हुआ हादसा याद कीजिए। 13 अगस्त को शाम 7:05 बजे अचानक सुरंग में भरे पानी और मलबे में कई मजदूर फंस गए और यह जगह एक खतरनाक रेस्क्यू जोन में बदल गई। लापता हुए लोगों की तलाश में रेस्क्यू वर्कर्स चौबीसों घंटे कीचड़, अस्थिर हालात और बढ़ते जलस्तर से जूझते रहे। 18 अगस्त तक मृतकों की संख्या बढ़कर 10 हो गई। हादसे के वक्त रेस्क्यू वर्कर्स एक और ऐसे दुश्मन से लड़ रहे थे, जो हर शाम पहाड़ों में आता है और उसे रोकने की क्षमता किसी में नहीं थी- वह था अंधेरा। रेस्क्यू टीम में शायद किसी ने कहा होगा कि ‘अगर हादसा सुबह 7:05 बजे होता तो हम सूरज की रोशनी में बेहतर काम कर पाते।’ अब इसी रेस्क्यू ऑपरेशन की कल्पना एक असाधारण संभावना के साथ कीजिए। रात में बारिश हो रही है। सुरंग की एंट्रेंस कीचड़ और मलबे से घिरी है। विजिबिलिटी कम है। रेस्क्यू टीम को काम जारी रखना है। लेकिन एक्सकेवेटर का हर मूवमेंट, अस्थिर मलबे का हर निरीक्षण और रेस्क्यू वर्कर्स का हर कदम बेहद मुश्किल होता जा रहा है। तभी कंट्रोल रूम में कोई कहता है, ‘सूर्य को चालू कर दो।’ यह सुनने में साइंस फिक्शन जैसा लगे, लेकिन कैलिफोर्निया की कंपनी ‘रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल’ ऐसा कुछ बनाने की कोशिश कर रही है, जो इस संभावना के बेहद करीब है। यह कंपनी ऐसे सैटेलाइट विकसित कर रही है, जिन पर बड़े रिफ्लेक्टिव सरफेस लगे होंगे। ये सरफेस सूर्यास्त के बाद अंतरिक्ष से सूरज की रोशनी को धरती पर चुनिंदा जगहों पर री-डायरेक्ट कर सकेंगे। कंपनी का घोषित विजन है- ‘सनलाइट ऑन डिमांड।’ इस तकनीक के संभावित इस्तेमालों में सर्च एंड रेस्क्यू भी शामिल है। तो कल्पना कीजिए कि पीपलकोटी के रेस्क्यू जोन के ऊपर से ‘रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल’ का कोई सैटेलाइट गुजर रहा है। उसका मिरर तयशुदा क्षेत्र की ओर कर दिया गया है। अंतरिक्ष से सूरज की रोशनी को री-डायरेक्ट किया गया। कुछ क्षण पहले ही हिमालय क्षेत्र के अंधेरे में डूबी रेस्क्यू साइट पर अचानक अतिरिक्त रोशनी आ जाती है। एक्सकेवेटर ऑपरेटर मलबे को ज्यादा स्पष्ट देख सकता है। रेस्क्यू टीम सुरंग के मुहाने पर हो रहे बदलाव देख सकती है। बचाव उपकरण ले जा रहे वर्कर्स ज्यादा भरोसे के साथ आगे बढ़ सकते हैं। मेडिकल टीम ट्रीटमेंट एरिया बना सकती है। सर्च टीम दिन की रोशनी का इंतजार करने के बजाय तलाश जारी रख सकती है। यह तकनीक ताकतवर फ्लड लाइट्स, जनरेटर या रेस्क्यू इक्विपमेंट का विकल्प नहीं होगी। यह बंद पड़ी सुरंग के भीतर दोपहरी जैसी रोशनी भी नहीं कर पाएगी। लेकिन ‘रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल’ के पहले डेमंस्ट्रेशन से उम्मीद है कि सैटेलाइट के एक बार गुजरने के दौरान करीब पांच मिनट के लिए पूर्णिमा के चांद जितनी रोशनी हो पाएगी। कंपनी 2026 में अपना पहला डेमंस्ट्रेशन सैटेलाइट भेजने की योजना बना रही है। सुनने में यह मामूली लग सकता है, लेकिन दूसरे तरीके से सोचिए। रेस्क्यू ऑपरेशन में हमेशा किसी चमत्कार का इंतजार नहीं होता। कई बार इसमें महज विजिबिलिटी की जरूरत होती है। अगर चंद अतिरिक्त मिनटों की उपयोगी रोशनी से टीम को सुरक्षित रास्ता पहचानने, मूवमेंट देखने, मशीनरी को ज्यादा एक्यूरेसी से लगाने या महत्वपूर्ण सर्च को जारी रखने में मदद मिल जाए तो मानिए कि टेक्नोलॉजी ने पहले ही ऐसा कुछ हासिल कर लिया है, जो इमरजेंसी में पैसे से भी नहीं खरीदा जा सकता। और वह है संकट में गोल्डन ऑवर। पारंपरिक तौर पर दुनिया ने आपदाओं से निपटने के लिए पहले से उपलब्ध टूल्स को ही बेहतर बनाया है- मजबूत एक्सकेवेटर, बेहतर ड्रोन, थर्मल कैमरे, कम्युनिकेशन सिस्टम, हेलीकॉप्टर और मेडिकल इक्विपमेंट। यह अलग-सी प्रतिक्रिया रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल जैसी कंपनियों को दिलचस्प बनाती है। बेशक, यह टेक्नोलॉजी अभी एक्सपेरिमेंटल है। एस्ट्रोनॉमी, लाइट पॉल्यूशन, वाइल्ड लाइफ और रिफ्लेक्टेड सनलाइट के जिम्मेदारीपूर्ण इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल भी हैं। रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल खुद कहती है कि उसके शुरुआती डेमंस्ट्रेशन नियंत्रित और सीमित रखने के लिए डिजाइन किए गए हैं। फंडा यह है कि सवाल कुछ अलग तरीके से पूछा जाए : अगर नाइट रेस्क्यू के दौरान विजिबिलिटी नहीं है तो क्या हम रोशनी के लिए धरती से परे भी देख सकते हैं? नए दौर के इनोवेटर्स बिना किसी ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्टर के बहुत-सी चीजें मुहैया कराने के रास्ते तलाश रहे हैं। और यही बात उन्हें स्पेशल जेनरेशन बनाती है।
एन. रघुरामन का कॉलम:जब किस्मत अंधेरा पैदा करे तो नए इनोवेटर्स को रोशनी लाने की कोशिश करनी चाहिए

