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एन. रघुरामन का कॉलम:क्यूआर कोड महज जानकारी का जरिया है, हाइजीन का सबूत नहीं

स्ट्रीट फूड सिर्फ लखनऊ ही नहीं, इंदौर जैसे शहरों की भी शान है। या फिर कहें कि हर शहर के कुछ खास हिस्से उसकी शान होते हैं, जैसे मुम्बई में घाटकोपर की ‘खाऊ गली’, बांद्रा का एल्को मार्केट, दिल्ली में चांदनी चौक, चावड़ी बाजार और करोल बाग, जयपुर में चौड़ा रास्ता, जौहरी बाजार और एमआई रोड। गुजरात के कई शहरों को तो भूलना ही नहीं चाहिए। हाल ही में मुझे पता चला कि अहमदाबाद की क्यूआर कोड आधारित फूड सेफ्टी और फीडबैक व्यवस्था से प्रेरित होकर लखनऊ के लोगों ने भी अपने नगर निगम और फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से शहर के फूड हब्स में हाइजीन और पारदर्शिता बेहतर करने के लिए ऐसी ही व्यवस्था अपनाने की मांग की है। इससे ग्राहक दुकानों पर लगे क्यूआर कोड स्कैन करके विक्रेता का रजिस्ट्रेशन देख सकेंगे, हाइजीन नियमों का पालन जांच सकेंगे और शिकायत या फीडबैक दे सकेंगे। शुरुआत में हजरतगंज, अमीनाबाद, चौक और गोमती नगर इलाकों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का विचार है। यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब समय-समय पर निरीक्षण होते हैं तो यह क्यूआर-लिंक्ड ग्रिवेंस प्लेटफॉर्म जवाबदेही बढ़ा सकता है और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई में अधिकारियों की मदद भी कर सकता है, लेकिन हाइजीन जैसी रोजमर्रा की समस्या में यह कैसे कारगर होगा? चूंकि स्ट्रीट वेंडर्स ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते तो सिर्फ एक क्यूआर कोड हाइजीन की गारंटी नहीं देता। यह इतनी-सी गारंटी देता है कि कोई व्यक्ति जानकारी ले सकता है। यह विश्वसनीयता भी इस बात पर निर्भर करती है कि जानकारी कौन कलेक्ट करता है, उसे सत्यापित करता है और यह कितनी बार अपडेट की जाती है। जब करोड़ों भारतीय हर हफ्ते स्ट्रीट फूड खाते हैं तो क्या हर आउटलेट पर क्यूआर कोड लगाना हाइजीन सुधारने के लिए पर्याप्त है? हो भी सकता है और नहीं भी। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, लखनऊ, हैदराबाद, अहमदाबाद और बेंगलुरु जैसे किसी भी बड़े शहर में देखिए, स्ट्रीट फूड ऑफिस-वर्कर्स, स्टूडेंट्स, पर्यटकों और प्रवासी कामगारों के लिए रोज का भोजन है। चूंकि यह असंगठित बाजार है तो अनुमानत: इसका टर्नओवर कुछ लाख करोड़ रुपए का है। यह सब्जी, मसाले, डेयरी, मीट, ईंधन, बर्तन, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स सप्लाई करने वाले ऐसे लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार देता है, जो हाइजीन को लेकर बहुत कम शिक्षित होते हैं। फिर सबसे बड़ा सवाल है कि हमारे वेंडर्स की रेटिंग किसे करनी चाहिए? हम सभी सोचते हैं कि हमारे ग्राहक सबसे बेहतर रेटिंग कर सकते हैं। लेकिन हममें से अधिकतर यह आकलन नहीं कर सकते कि क्या कुकिंग ऑइल बार-बार इस्तेमाल किया गया है, क्या पानी पीने योग्य है या सामग्री दूषित तो नहीं। लेकिन एक और समस्या भी है। हममें से जो लोग मूल्यांकन में बेहतर थे, अचानक इंफ्लुएंसर्स की तरह व्यवहार करने लगते हैं और पक्षपाती हो जाते हैं। इधर, हाइजीन और नियमों के पालन को परखने के लिए प्रशिक्षित फूड सेफ्टी इंस्पेक्टरों की संख्या हमेशा कम होती है। अनियमित निरीक्षण और इंस्पेक्टरों के विवेकाधिकार के चलते घूसखोरी की गुंजाइश भी बन सकती है। थर्ड पार्टी क्वालिटी ऑडिट करने वाले स्वतंत्र ऑडिटर या मान्यता प्राप्त एजेंसियां महंगी होती हैं और इन्हें हजारों स्ट्रीट वेंडर्स के लिए लागू कर पाना भी कठिन है। असल मुद्दा यह गलतफहमी है कि टेक्नोलॉजी गवर्नेंस की जगह ले सकती है। ऐसा नहीं हो सकता। क्यूआर कोड बता सकता है कि विक्रेता कौन है। लेकिन यह नहीं बता सकता कि तेल दस बार तो इस्तेमाल नहीं हो चुका, पानी दूषित तो नहीं या कच्चा मीट सुरक्षित तरीके से रखा गया था या नहीं। इसके लिए प्रशिक्षित इंस्पेक्टर, समय-समय पर लैब टेस्ट और ऐसे विक्रेता चाहिए, जो हाइजीन का महत्व समझते हों। अधिकतर स्ट्रीट वेंडर्स जानबूझकर अन-हाइजीनिक नहीं होते। उनमें से बहुत-से अप्रशिक्षित होते हैं। इसलिए जरूरत है कि हम उन्हें ट्रेनिंग दें, न कि सिर्फ नियमों में बांधें। फंडा यह है कि कि सबसे मजबूत समाधान किसी एक मैकेनिज्म पर निर्भर रहना नहीं, बल्कि ऐसा लेयर्ड सिस्टम तैयार करना है, जिसमें तकनीकी, निरीक्षण, विक्रेता और ग्राहक- सभी की अपनी अलग भूमिका हो।

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