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एन. रघुरामन का कॉलम:एआई कोर इंजीनियरिंग को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उसे री-इन्वेंट करेगा

मैंने शुक्रवार को दो खबरें पढ़ीं। अमेरिका में ज्यादातर विश्वविद्यालय इतनी तेजी से एआई प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं कि शोधकर्ताओं के लिए उन्हें ट्रैक करना कठिन हो रहा है। इसके पीछे सोच यह है कि चूंकि एआई वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदल रहा है, इसलिए कॉलेज और स्टूडेंट्स, दोनों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना जरूरी है। इधर, तेलंगाना की एक खबर में था कि आईटी जॉब मार्केट में अनिश्चितता और फ्रेशर्स के लिए घटते अवसरों के कारण पारंपरिक इंजीनियरिंग ब्रांच फिर से लोकप्रिय हो रही है। खबर में तकनीकी शिक्षा विभाग द्वारा जारी सीट आवंटन का हवाला देते हुए कहा गया कि सिविल, मैकेनिकल और उनसे जुड़ी शाखाओं की कम से कम 80% सीटें अलॉट हो चुकी हैं। केमिकल इंजीनियरिंग, एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग और फूड टेक्नोलॉजी जैसे गैर-आईटी कोर्सेस में भी 82% सीटें भरने की उम्मीद है। कॉलेज एजुकेशन के इन दो पहलुओं ने मुझे कुछ विशेषज्ञों से बात करने को मजबूर किया। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि ‘एक समय उद्योग गर्व से खुद को ‘कम्प्यूटराइज्ड’ बताते थे। बाद में सभी कम्प्यूटराइज्ड हो गए और यह विशेषण गायब हो गया। इंटरनेट के साथ भी यही हुआ। आज कोई कंपनी ‘इंटरनेट-एनेबल्ड’ होने का दावा नहीं करती, क्योंकि डिजिटल कनेक्टिविटी स्वाभाविक हो चुकी है।’ उन्होंने कहा कि ‘एआई भी उसी दिशा में बढ़ रहा है। आने वाले दशक में कॉलेज शायद ‘एआई-एनेबल्ड मैकेनिकल इंजीनियरिंग’ या ‘एआई-एनेबल्ड सिविल इंजीनियरिंग’ जैसी मार्केटिंग नहीं करेंगे। गणित, फिजिक्स और कंप्यूटर लिट्रेसी की तरह एआई भी बेसिक टूल बन जाएगा। हर इंजीनियर से अपेक्षा होगी कि ब्रांच भले कोई भी हो, वह इंटेलिजेंट सिस्टम्स के साथ काम करना तो जानता ही होगा।’ विशेषज्ञ सही हैं। तेलंगाना से हर साल सीएसई और संबंधित ब्रांचों से लगभग 60 हजार ग्रेजुएट पास होते हैं, जबकि एंट्री-लेवल आईटी जॉब कम हो रहे हैं। स्टूडेंट्स को लगता है कि कोर ब्रांचों में प्रतिस्पर्धा कम और अकादमिक रूप से बेहतर प्रदर्शन की गुंजाइश ज्यादा है। साथ ही प्राइवेट और सरकारी, दोनों क्षेत्रों में अवसर भी मौजूद हैं। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि भविष्य में एआई केवल कोड लिखने या सवालों के जवाब देने वाला चैटबॉट नहीं रहेगा। अपने मूल स्वरूप में एआई ऐसी तकनीक है, जो डेटा एनालाइज करती है, पैटर्न पहचानती है, परिणामों का अनुमान लगाती है और तेज गति से बेहतर निर्णय लेने में मदद करती है। हर इंजीनियरिंग शाखा ऐसा डेटा तैयार करती है। जिस डेटा को एनालाइज करने में हमें दो हफ्ते लगते हैं, एआई उसे चंद मिनटों में कर देता है। एक सिविल इंजीनियर स्ट्रक्चरलर स्ट्रेस, निर्माण गुणवत्ता और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी का काम करता है। एआई ड्रोन से ली गई तस्वीरों का विश्लेषण कर पुलों की दरारों को खतरनाक बनने से पहले ही पहचान सकता है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में भी यही बदलाव दिख रहा है। आधुनिक कारखाने मशीनों में खराबी आने से पहले ही उसका पता लगाने के लिए एआई पर निर्भर हो रहे हैं। ऐसे में जो इंजीनियर मशीनों और इंटेलिजेंट सॉफ्टवेयर दोनों को समझते हैं, बेहद अहम बन जाएंगे। यही रुझान इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में भी दिखता है। स्मार्ट ग्रिड इलेक्ट्रिसिटी डिमांड का अनुमान लगाने, रिन्युएबल एनर्जी स्रोतों में बैलेंस बनाने और रियल-टाइम में गड़बड़ी का पता लगाने के लिए एआई इस्तेमाल कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र में प्रिसिजन फार्मिंग बढ़ रही है, जहां एआई सैटेलाइट तस्वीरों, मौसम पूर्वानुमान और मिट्टी की स्थिति का विश्लेषण करके सिंचाई और फर्टिलाइजर के उपयोग के बारे में सुझाव देता है। केमिकल इंजीनियर नया मैटेरियल बनाने, मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस को ऑप्टिमाइज करने और अपशिष्ट घटाने के लिए एआई उपयोग कर रहे हैं। इनमें से कोई भी बदलाव इंजीनियरों की जरूरत को खत्म नहीं करता। उल्टा, ये उन इंजीनियरों की कीमत और बढ़ाते हैं, जिनके पास अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता के साथ डिजिटल स्किल भी है। यह बताता है कि कोर इंजीनियरिंग की ओर बढ़ते रुझान को टेक्नोलॉजी से पीछे हटने के तौर पर देखने की गलती नहीं की जानी चाहिए। भविष्य न केवल सॉफ्टवेयर इंजीनियरों का है और न सिर्फ पारंपरिक इंजीनियरों का, नई पीढ़ी के उन पेशेवरों का भी है, जो एआई का उपयोग करके अधिक स्मार्ट, सुरक्षित और कुशल फिजिकल वर्ल्ड बना सकें। फंडा यह है कि एआई कोई गुजरता हुआ ट्रेंड नहीं है और न ही कोर इंजीनियरिंग कोई नॉस्टेल्जिक कमबैक कर रही है। ये दोनों अब अलग-अलग नहीं रह सकते। आने वाले दशकों में इंजीनियरिंग एजुकेशन मशीनों और एल्गोरिद्म के बीच चुनाव के इर्द-गिर्द नहीं चलेगी, बल्कि इन दोनों में ही महारत हासिल करनी होगी।

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