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एन. रघुरामन का कॉलम:आपात स्थिति में घबराहट के बजाय धैर्य का चुनाव करें

पिछले हफ्ते सोमवार से बुधवार के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी पर स्थित दो अलग-अलग स्थानों पर दो घटनाएं हुईं। एक मध्य प्रदेश के भोपाल में और दूसरी जापान के क्यूशू द्वीप पर। भोपाल में मानसून के भारी बादल छाए हुए थे, जिनमें जापान के चिंता से भरे माहौल की झलक दिख रही थी। ‘किसान क्रांति यात्रा’ के तहत किसानों के विरोध प्रदर्शन ने भोपाल की मुख्य सड़क को पूरी तरह जाम कर दिया। अचानक स्कूल बंद हो गए। माता-पिता परेशान थे। दमघोंटू, उमस भरी गर्मी से हर कार ड्राइवर परेशान था। मुख्य होशंगाबाद रोड पूरी तरह ब्लॉक थी। किसी को बिजनेस प्रेजेंटेशन देना था, तो किसी को बुजुर्ग पैरेंट्स की देखभाल के लिए घर पहुंचना था। लेकिन कोई एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सका। कई लोग फोन पर लगातार आ रहे नोटिफिकेशनों में उलझे थे। कुछ स्टीयरिंग पर हाथ मार-मार कर लगातार हॉर्न बजा रहे थे। कुछ लोगों के लिए यह हालात असहनीय थे तो वे विंडो-ग्लास नीचे कर जाम को कोसने लगे। कुछ लोगों ने समीप की छोटी गलियों में घुस कर भोपाल-जबलपुर हाईवे तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने आपात स्थिति में हो सकने वाली आवाजाही को भी रोक दिया। बड़े वाहन उन गलियों में मुड़ नहीं सकते तो इस वजह से दोपहिया वाहन भी फंस गए। मैं भी उसी ट्रैफिक जाम में मौजूद था। कई लोगों ने कार चालकों से धैर्य रखने की अपील की। लेकिन सभी जल्दी घर पहुंचना चाहते थे और इस अफरातफरी में कोई भी समय से नहीं पहुंच पाया। इस अधीरता का असर यह हुआ कि कुछ लोगों को दोस्तों या रिश्तेदारों के घरों पर रात गुजारनी पड़ी, जबकि भोपाल दिल्ली से बहुत छोटा शहर है। बीते मंगलवार को ठीक इसी दौरान जापान के दक्षिणी द्वीप पर 7.1 तीव्रता का भूकंप आया। 1500 से ज्यादा इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं, जिनमें से 179 पूरी तरह तहस-नहस हो गईं। कई लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए। करीब 80 हजार घर तो बिना पानी-बिजली के रहे। कई लोग 24 से 48 घंटों तक नहीं सोए। जिनके घर क्षतिग्रस्त हुए, उनका मन चिंता से बोझिल था। संकट में इंसान की प्रवृत्ति होती है कि वह हड़बड़ाहट में जानकारी लेने के लिए चिल्लाता है, आगे जाकर देखता है कि कैसे समस्या हल हो सकती है। वह अपने परिवार के लिए हरसंभव प्रयास करने की कोशिश करता है। लेकिन द्वीप के उस तबाह हुए इलाके में बहुत से लोग कतारों में खाना-पानी लेने के लिए नहीं, बल्कि स्वयंसेवक के तौर पर उन लोगों तक खाना-पानी पहुंचाने के लिए खड़े थे, जिनके घर पूरी तरह टूट चुके थे या जो भूखे थे। कतार में खड़े कई लोगों के पैरों में दर्द था। उन्हें अपने जूतों के नीचे अब भी आफ्टरशॉक महसूस हो रहे थे, लेकिन फिर भी वे अपनी जगह खड़े रहे। यही अपने सबसे शुद्ध रूप में ‘गामन’ था। ‘गामन’ एक प्रमुख जापानी कल्चरल कॉन्सेप्ट है। इसका अर्थ है- सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए अपने निजी दर्द, गुस्से या शिकायतों को छिपाए रखना। प्राकृतिक आपदाओं, कठिनाइयों या दुखों का शांति और मजबूती के साथ सामना करना। समाज और राष्ट्र की जरूरतों को अपनी व्यक्तिगत पीड़ा से ऊपर रखना। कहीं न कहीं हम सभी ऐसे बड़े हुए हैं कि हमें तत्काल संतुष्टि चाहिए या इसे ‘टू मिनट्स नूडल्स जनरेशन’ भी कहा जा सकता है। लेकिन हमें अपने स्कूल जाने वाले बच्चों को ‘गामन’ के ये सबक जरूर सिखाने चाहिए। यह उनकी एंग्जायटी घटाने में हमारी मदद करेगा और वो इमरजेंसी में भी शांत रहना सीखेंगे। फंडा यह है कि जब बुनियादी ढांचा चरमराए या समाज ठहर जाए तो असली मजबूती इससे नहीं मापी जाती कि आप और मैं कितनी जल्दी घर पहुंच गए। यह उन शांत पलों में दिखाई देती है, जब हम जैसे आम लोग घबराहट के बजाय धैर्य और व्यक्तिगत कुंठाओं से ऊपर सामूहिक जिम्मेदारी का चुनाव करते हैं।

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