कई वर्षों से राजनीतिक हलकों में एक तर्क बार-बार सामने आता रहा है। यह कि गांधी परिवार के सदस्य अनजाने में ही भाजपा की राजनीतिक सफलता को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। यह तर्क खासकर राहुल गांधी के संदर्भ में दिया जाता है। उनके खिलाफ दो प्रमुख दलीलें दी जाती हैं। पहली यह कि वे एक राजनीतिक वंश से आते हैं, जबकि अब इस तरह की राजनीति को जनता का समर्थन नहीं मिल रहा है। दूसरी यह कि राहुल राजनीतिक रूप से कुशल नहीं हैं। ऐसे में भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी बन जाती है। तर्क यह भी है कि बहुत-से लोग भाजपा का समर्थन इसलिए करते हैं, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें कोई भरोसेमंद विकल्प दिखाई नहीं देता। ऐसे मतदाताओं को बेहतर कल्पनाशीलता और अधिक कुशल राजनीतिक रणनीति के जरिए अपनी ओर किया जा सकता है। हाल ही में इस सोच को एक बड़े बौद्धिक समर्थन का आधार मिला। रामचंद्र गुहा भारत के प्रमुख बुद्धिजीवियों में से हैं और एक सम्मानित इतिहासकार भी हैं। अपने एक लेख में गुहा ने गांधी परिवार को ‘मोदी का मददगार’ बताया है। हालांकि गुहा यह भी स्वीकार करते हैं कि राहुल एक अच्छे इंसान हैं। गुहा के अनुसार राहुल में अनुशासन, गंभीरता और अनुभव की कमी है। राहुल ने केवल भारत जोड़ो यात्रा के दौरान ही अनुशासन दिखाया। उनकी मेहनत करने की क्षमता लगातार नहीं दिखाई देती है। इसके विपरीत, उनके प्रतिद्वंद्वी हर समय बिना थके काम करते रहते हैं। राहुल एक्स पर जितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, उसे पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में लगाना चाहिए। इन आलोचनाओं का आकलन कैसे किया जाए? गुहा कहते हैं कि वे केवल राय नहीं दे रहे, बल्कि तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके अनुसार उनका लेख तथ्यों पर आधारित सबूतों से प्रेरित है, न कि गांधी परिवार या सामान्य रूप से राजनीतिक वंशवाद के खिलाफ उनकी निजी सोच से। लेकिन यहीं इस तरह की व्याख्या की सबसे बड़ी समस्या है। व्यक्तियों (नेताओं) पर इतना अधिक ध्यान देना हैरानी की बात है। इसमें संस्थाओं की कोई भूमिका नहीं दिखाई देती। जबकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से राजनीतिक विश्लेषण में बड़े राजनीतिक परिणामों- जैसे लगातार चुनावी हार या शासन व्यवस्था में बदलाव- की व्याख्या आमतौर पर नेताओं के व्यवहार और संस्थागत या संरचनात्मक बदलावों, दोनों को मिलाकर की जाती है। दूसरे शब्दों में, बड़े राजनीतिक परिणामों को समझने के लिए कई अलग-अलग कारणों को एक साथ देखना पड़ता है। नेतृत्व उनमें से सिर्फ एक कारण होता है। गुहा यह जरूर कहते हैं कि सार्वजनिक संस्थाओं को कमजोर किया गया है, मीडिया और न्यायपालिका पर दबाव बनाया गया है, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नुकसान पहुंचाया गया है, लेकिन कांग्रेस की चुनावी हार की उनकी व्याख्या में इन बातों की भूमिका नहीं है।
1971 के बाद इंदिरा गांधी की जीत और पाकिस्तान के साथ युद्ध में विजय ने उन्हें अभूतपूर्व शक्ति दी थी। फिर भी इलाहाबाद के एक न्यायाधीश ने उनका चुनाव रद्द कर दिया था। इसी तरह, 1950 के दशक की शुरुआत में नेहरू की शक्ति की बराबरी कौन कर सकता था? फिर भी अदालतों ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक मानते हुए भूमि सुधार कानूनों की वैधता को खारिज कर दिया था, जबकि वह नेहरू की कृषि नीति का मुख्य आधार था। मजबूत सरकार होने के बावजूद अदालतें स्वतंत्र रूप से काम कर सकती हैं। राहुल गांधी अपने नेतृत्व के तरीके में बदलाव कर सकते हैं और गुहा की कुछ आलोचनाओं को स्वीकार भी कर सकते हैं। लेकिन भाजपा के लगातार सत्ता में बने रहने की व्याख्या को केवल राहुल की नेतृत्व संबंधी कमियों पर केंद्रित करना ठीक नहीं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही राजनीतिक विश्लेषण में बड़े परिणामों- जैसे चुनावी हार या शासन व्यवस्था में बदलाव- की व्याख्या नेताओं के व्यवहार और संस्थागत बदलावों, दोनों को मिलाकर की जाती रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:नेतृत्व की कमी ही राजनीति का रुख तय नहीं कर सकती

