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आरती जेरथ का कॉलम:देश को विपक्ष से सकारात्मक बातों की भी अपेक्षा होती है

पिछले सप्ताह राजधानी दिल्ली में ‘रचनात्मक कांग्रेस’ के एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान दुनिया के नेताओं को गले लगाने की आदत का मजाक उड़ाया। अपेक्षाकृत युवा दर्शक इस मजाक पर हंसे जरूर, लेकिन बात तब अरुचिकर हो गई, जब कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने इसमें इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को भी घसीट लिया। शायद अब समय आ गया है कि विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी उपहास करने की अपनी इस रणनीति की दीर्घकालिक उपयोगिता पर आत्ममंथन करें। मंच पर इस तरह का हास्य-प्रदर्शन भले ही सुर्खियां बटोरने में सफल रहता हो, लेकिन यह सरकार की विदेश नीति की सुविचारित आलोचना का विकल्प नहीं हो सकता। जनता विपक्ष के नेता से यही अपेक्षा करती है कि वह उसके सामने कुछ ठोस विचार प्रस्तुत करे, ताकि चुनाव में किसी विकल्प का चयन करने से पहले वह अपना मन बना सके। संसदीय व्यवस्था में विपक्ष का नेता मौजूदा सरकार की आलोचना करते हुए एक वैकल्पिक नीतिगत ढांचा भी प्रस्तुत करता है। इसमें संदेह नहीं कि पिछले 12 वर्षों में राहुल गांधी की ‘पप्पू’ वाली छवि गढ़ने के लिए काफी प्रयास किए गए हैं और संसाधन लगाए गए हैं। ऐसे में ताज्जुब नहीं कि राहुल भी अब प्रधानमंत्री के आभामण्डल में सेंध लगाने के लिए उतनी ही तीव्रता से पलटवार कर रहे हैं। लेकिन इसने देश के राजनीतिक विमर्श को दुर्भाग्यपूर्ण स्तर तक गिराया है। समय के साथ ही राजनीति भी बदलती है और बदलनी चाहिए भी। राहुल गांधी ने 2022 में 145 दिनों तक चली भारत जोड़ो यात्रा के जरिए अपनी छवि को बदलने की कोशिश की थी। यह यात्रा दक्षिण में कन्याकुमारी से उत्तर में श्रीनगर तक 4,000 किलोमीटर से अधिक चली। तब उनकी प्रतिबद्धता, दृढ़ता और आम लोगों के साथ सहज-संवाद ने भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया था। 2024 के आम चुनाव में इसके परिणाम भी देखने को मिले। कांग्रेस ने न केवल लोकसभा में अपनी सीटों की संख्या दोगुनी करके 99 कर ली, बल्कि भाजपा को बहुमत पाने से भी रोक दिया। उसे गठबंधन सरकार बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। हाल में देशभर में युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों के बाद राजनीति में समीकरण बदलने की संभावना बन सकती है। अगर राहुल गांधी इस आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा का लाभ उठाना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी छवि में एक और बदलाव लाना होगा। उनकी ‘पप्पू’ वाली छवि को तो समाप्त किया जा चुका है, लेकिन राहुल गांधी को अब यह भी स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वे किन विचारों और नीतियों के पक्ष में खड़े हैं और कांग्रेस की सरकार या कांग्रेस के नेतृत्व वाली किसी गठबंधन सरकार का भारत के लोगों के लिए क्या मतलब होगा। यह खास तौर पर युवा मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्होंने पिछले 12 वर्षों में खड़ी की गई खामोशी की दीवार को तोड़ते हुए सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही की मांग की है। अब वे बेहतर शिक्षा और रोजगार के अपने अधिकार को हासिल करने, असहमति जताने और अपनी भाषा में अपनी बात कहने की आजादी की खुलकर और जमकर आजमाइश करने लगे हैं। लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस को अपनी जीत के अवसरों को उजला बनाना है तो राहुल गांधी को मौजूदा सरकार को लगातार नीचा दिखाने वाले नकारात्मक अभियान पर टिके रहने के बजाय, अधिक गंभीरता और गरिमा के साथ एक सकारात्मक एजेंडा सामने रखना होगा। उस व्यक्ति से गंभीरता अधिक अपेक्षित होती है, जो अगली सरकार का नेतृत्व करने की उम्मीद रखता हो। हमने राहुल को ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में देखा है। सड़कों पर उतरने वाले जमीनी नेता के रूप में भी देखा है। पिछले सप्ताह हमने उनका ट्रोलिंग करने वाला रूप भी देख लिया। लेकिन देश को अभी तक इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि अगर कांग्रेस अगला चुनाव जीतती है तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री कार्यालय में क्या लेकर आएंगे? अभी तक उन्होंने धर्मनिरपेक्षता से लेकर ‘मोहब्बत की दुकान’, ‘पांच न्याय’, जाति जनगणना और अब छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों तक कई मुद्दों और राजनीतिक नारों को आजमाया है। लेकिन आने वाले समय में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती वे खुद हैं। उन्होंने उपहास और तीखी आलोचना को अपनी राजनीति की पहचान तो बना लिया है, लेकिन क्या वे इसे बदलकर ऐसा विश्वसनीय राजनीतिक नैरेटिव भी तैयार कर सकते हैं, जिससे 2029 में कांग्रेस और बेहतर विकल्प के रूप में सामने आए? राहुल गांधी को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वे किन विचारों और नीतियों के पक्ष में खड़े हैं और भविष्य में कांग्रेस की सरकार का भारत के लोगों के लिए क्या मतलब होगा। यह खास तौर पर युवा मतदाताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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