बीते कुछ समय में शिवसेना के 6, तृणमूल के 20 और आप के 7 लोकसभा-राज्यसभा सांसद दूसरी पार्टियों में शामिल हुए हैं। तीनों ही मामलों में संबंधित दलों ने इन विलयों का विरोध किया था। इसके बावजूद, दल-बदल विरोधी कानून के तहत ये वैध माने जाते हैं। इसके पीछे कौन-सा तकनीकी पेंच है? दल-बदल विरोधी कानून को तो एक वास्तविक समस्या से निपटने के लिए बनाया गया था। सांसद और विधायक बार-बार दल बदलकर दूसरी पार्टियों में शामिल हो जाते थे। हरियाणा के विधायक गया लाल ने तो एक ही दिन में तीन बार दल बदले थे। मंत्रिपद या अन्य लाभों के लालच में विधायकों को दल बदलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, जिससे निर्वाचित सरकारें अस्थिर हो जाती थीं। 1967-68 के दौरान ही विभिन्न विधानसभाओं में दल बदलने वाले 210 विधायकों में से 116 को मंत्री बना दिया गया था। इस पर रोक लगाने के लिए 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसके तहत जनप्रतिनिधि जिस दल के टिकट पर निर्वाचित हुए हों, अगर वो उसे छोड़ते हैं, तो उनकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। इसका उद्देश्य स्पष्ट था- राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और मतदाताओं के जनादेश की रक्षा करना। हालांकि, इस कानून ने राजनीतिक दलों और चुने हुए प्रतिनिधियों के सम्बंधों की प्रकृति भी बदल दी। दसवीं अनुसूची से पहले विधायकों और सांसदों के पास अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता थी। वे अपने विवेक, जनहित या अपने निर्वाचन क्षेत्र की आवश्यकताओं के आधार पर सदन में मतदान कर सकते थे। लेकिन दल-बदल कानून ने शक्ति-संतुलन राजनीतिक दलों के पक्ष में कर दिया। यदि कोई सांसद या विधायक पार्टी-व्हिप का उल्लंघन करता या पार्टी की सदस्यता छोड़ता, तो उसे डिसक्वालिफिकेशन का सामना करना पड़ सकता था। अर्थात् इस कानून के अंदर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर दलगत अनुशासन को प्राथमिकता दी गई। परंतु कानून ने कुछ अपवाद भी स्वीकार किए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण था राजनीतिक दलों का विलय। इस प्रावधान के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में विलय हो जाए और उसे सदन में उस दल के दो-तिहाई सांसदों या विधायकों का समर्थन प्राप्त हो, तो ऐसे निर्वाचित प्रतिनिधियों को अयोग्यता से संरक्षण मिलेगा। कानून की परिकल्पना यह थी कि विलय की प्रक्रिया में राजनीतिक दल और उसके निर्वाचित प्रतिनिधि- दोनों की भूमिका होगी। हालांकि समय के साथ न्यायालयों ने इस प्रावधान की ऐसी व्याख्या बनाई, जो दल-बदल कानून के व्यापक उद्देश्य से अलग दिखाई देती है। न्यायालयों ने दो-तिहाई बहुमत की शर्त को ही पर्याप्त मानना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप यदि किसी दल के पर्याप्त संख्या में सांसद या विधायक एक साथ किसी अन्य दल में जाने का निर्णय लेते हैं, तो दसवीं अनुसूची के उद्देश्य से उसे विलय मान लिया जाता है, भले ही मूल दल अस्तित्व में बना रहे और इसका विरोध करे। उदाहरण के लिए, आम आदमी पार्टी एक स्वतंत्र दल के रूप में मौजूद है, लेकिन उसके दस में से सात राज्यसभा सांसद अब भाजपा के साथ हैं। इसी प्रकार तृणमूल आज भी सक्रिय है और उसने अपने सांसदों के विलय का विरोध किया है। फिर भी वर्तमान कानूनी व्याख्या के अनुसार, यदि आवश्यक संख्या पूरी हो जाती है, तो दल की आपत्ति निर्णायक नहीं रहेगी। यह एक विचित्र विरोधाभास रचता है। इस तरह के विलयों के राजनीतिक परिणाम गंभीर होते हैं। वे सदन में बहुमत का संतुलन बदल सकते हैं, महत्वपूर्ण विधेयकों पर मतदान को प्रभावित कर सकते हैं और सरकारों की स्थिरता को भी संकट में डाल सकते हैं। यह समस्या छोटे राज्यों और क्षेत्रीय दलों के लिए अधिक गंभीर है, जहां विधायकों की संख्या सीमित होती है। छोटी विधानसभाओं में दो-तिहाई का आंकड़ा पाना आसान होता है। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को महत्त्वपूर्ण माना गया था। इसीलिए यदि कोई सांसद या विधायक अपने दल के विरुद्ध जाता, तो अपनी सदस्यता खो सकता था। किंतु दल-विलय के प्रश्न में राजनीतिक दल की इच्छा को लगभग अप्रासंगिक बना दिया गया है। (ये लेखकों के अपने विचार हैं)
अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम:राजनीतिक दलों और नेताओं के रिश्तों में खींचतान का दौर
