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अमिताभ कांत का कॉलम:हमें दुनिया को अपनी सभ्यता की बेहतर कहानी सुनानी होगी

मुझे दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं से जुड़े महानतम संग्रहालयों को देखने का मौका मिला है। हाल ही में जब मैंने गीजा के पिरामिड, एथेंस के एक्रोपोलिस और भूमध्यसागर के किनारे पर बने बिब्लियोथेका अलेक्जेंड्रिना (पुस्तकालय) को देखा तो वहां के ऐतिहासिक महत्व को देखकर अभिभूत रह गया। गीजा के ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम में विश्वस्तरीय संरक्षण, सुचिंतित डिजाइन और जीवंत कहानियों के जरिए मिस्र की पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता से जुड़े एक लाख से अधिक पुरावशेष संग्रहित हैं। इनमें तूतनखामुन के मकबरे का खजाना भी है। एक्रोपोलिस में कांच के फर्श के नीचे प्राचीन बसावट को देखा जा सकता है, जो खुदाई में मिली थी। बिब्लियोथेका में ज्ञान को संरक्षित रखने के लिए किया गया निवेश स्पष्ट नजर आता है। भारत की सभ्यतागत विरासत भी इतनी ही समृद्ध है। हमारे पास सिंधु घाटी के सुनियोजित शहरों से लेकर स्मारकों, पांडुलिपियों, मंदिरों, किलों और पुरावशेषों तक दुनिया की बेहद समृद्ध ऐतिहासिक धरोहरें हैं। लेकिन जब भी मेरी डेस्क पर पर्यटन या शहरी विकास से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट की कोई फाइल आती तो वह एक ही समस्या में जाकर उलझ जाती थी। हमारे पास कहानियां तो बहुत हैं, लेकिन उन्हें कहने वाले पर्याप्त संस्थान नहीं हैं। हमारे सबसे अच्छे पुरावशेष संग्रहालयों में ही कैद हैं। मसलन, कोलकाता के इंडियन म्यूजियम में कला, पुरातत्व और प्राकृतिक इतिहास से जुड़ी 25 लाख वस्तुएं हैं, नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में दो लाख से अधिक पुरावशेषों का संग्रह है, लेकिन इनका एक छोटा-सा हिस्सा ही प्रदर्शित किया जाता है। इसमें भी समसामयिक डिजाइन, लाइटिंग और इंटरप्रिटेटिव मीडिया का सीमित ही उपयोग है। दरअसल, हमने उतनी महत्वाकांक्षा के साथ कभी हमारे इन संस्थानों में निवेश किया ही नहीं, जो हमारी महान विरासत को सहेजने, उनकी व्याख्या करने और इसे देश-दुनिया को बताने का काम करते हैं। हमारे म्यूजियम, आर्काइव्स और साइट इंटरप्रिटेशन सेंटर अपार संभावनाओं से भरे हैं, लेकिन उन्हें गंभीर संरक्षण, बेहतर क्यूरेशन, मजबूत डिजाइन और ज्यादा कल्पनाशीलता की जरूरत है। तभी वे उस सभ्यता के अनुरूप बन पाएंगे, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। नॉर्थ-साउथ ब्लॉक को राष्ट्रीय संग्रहालय में बदलने की योजना इस बात का प्रतीक है कि संस्कृति राष्ट्र की मूल पहचान से जुड़ा मसला है। इसे दुनिया के सबसे बड़े संग्रहालयों में से एक बनाने की योजना है। इसमें इमर्सिव डिजाइन और डिजिटल माध्यमों से हजारों वर्षों की भारतीय सभ्यता की यात्रा बताई जाएगी। उम्मीद है कि अगले तीन वर्षों में कंटेंट टीमें आठ थीम आधारित क्षेत्रों में लगभग 30 दीर्घाएं विकसित करेंगी। केंद्रीय संग्रहालयों, एएसआई की साइटों और राज्यों के संग्रहालयों से 80 हजार से एक लाख तक पुरावशेष यहां लाए जाएंगे। इन्हें प्राचीन इतिहास और ज्ञान-परंपराओं से लेकर आधुनिक भारत तक की यात्रा के क्रम में व्यवस्थित किया जाएगा। अब तक सत्ता के केंद्र कहे जाने वाले नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की पहचान अब महज दफ्तरों और औपचारिक आयोजनों से नहीं, बल्कि ऐसे स्थान के तौर पर होगी, जहां राष्ट्र को सुव्यस्थित स्मृतियों के जरिए देखा जा सकता है। यहां सिंधु घाटी के शहर, ज्ञान-परंपराएं, कोणार्क के सूर्य-रथ, चोलकालीन कांस्य प्रतिमाएं और संविधान से जुड़े दस्तावेज तक प्रदर्शित किए जाएंगे। स्पष्ट मानक तय किए जाएं तो रायसीना हिल की प्रत्येक गैलरी दुनिया के प्रमुख संग्रहालयों की बराबरी कर सकती है। यदि हम वाराणसी, हम्पी या जयपुर जैसे शहरों में भी ऐसे संग्रहालय विकसित करें, जो संरक्षण, डिजाइन और सेवाओं के मामले में विश्वस्तरीय मानकों पर खरे हों तो भारत खुद को वैश्विक पर्यटन सर्किट में स्थापित कर सकता है। पर्यटक आज आर्ट हॉलिडे, प्राइवेट म्यूजियम टूर और क्यूरेटेड यात्रा कार्यक्रमों पर काफी पैसा खर्च कर रहे हैं। सांस्कृतिक अनुभव देने वाली यात्राएं लग्जरी ट्रैवल ट्रेंड में अपना अहम स्थान बनाए हुए हैं। ऐसे में हम मौका न चूकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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