Site icon Socialblize

अमिताभ कांत का कॉलम:आने वाले कल के खेल-सितारों को तैयार करने का यही समय है

मौजूदा हालात को देखते हुए तो यह बेहद कठिन लगता है कि भारत 2034 के फीफा विश्वकप के लिए क्वालिफाई कर पाएगा। लेकिन 2034 को एक डेडलाइन के तौर पर जरूर लिया जा सकता है। तब तक भारत ऐसा फुटबॉल सिस्टम विकसित करे, जो विश्वकप के लिए क्वालिफाई करने के लिए चुनौती पेश कर सके। भारत अभी एशियाई देशों में से क्वालिफाई करने योग्य स्तर से काफी दूर है। हमारी टीम में निरंतरता का अभाव है और हमारा डेवलपमेंट सिस्टम ऐसे पर्याप्त फुटबॉलर तैयार नहीं कर पाता है, जो शीर्ष पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। हमारा मकसद यही होना चाहिए कि अगले 8 वर्षों में भारत एशिया का उन्नत फुटबॉल सिस्टम बने। यदि हमने यह कर लिया तो क्वालिफाई करना संभव है। इसके लिए पहली जरूरत है- संस्थागत स्थिरता। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और भारतीय खेल प्रशासन फ्रैमवर्क के तहत ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) के प्रशासनिक ढांचे से जुड़ी प्रक्रिया समाधान की दिशा में आगे बढ़ी है। प्राथमिकता सुधारों को लागू करने की हो। हमें इंडियन सुपर लीग के उभरते व्यावसायिक ढांचे को स्थिर, प्रतिस्पर्धी और आर्थिक तौर पर जिम्मेदार ऐसी पेशेवर व्यवस्था में बदलना होगा, जिसमें फेडरेशन की स्पष्ट भूमिका हो। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि क्या वह खेलों का भरोसेमंद कैलेंडर, मजबूत क्लब, खिलाड़ियों के लिए अनुबंध संबंधी निश्चितता और नेशनल लीग के लिए आपस में जुड़ा ढांचा उपलब्ध करा पाता है। कॉर्पोरेट और सरकारी सहायता भी तभी बढ़ेगी, जब पूरा इको-सिस्टम पेशेवर ढंग से संचालित हो। दूसरी जरूरत यह है कि इस पूरी व्यवस्था को भारतीय खिलाड़ी तैयार करने के इर्द-गिर्द संगठित किया जाए। विश्व कप का क्वालिफिकेशन महज इससे हासिल नहीं होता कि हर कुछ वर्षों में राष्ट्रीय टीम का कोच बदल दिया जाए या बड़े मुकाबलों से पहले छोटे-मोटे प्रशिक्षण शिविर लगा दिए जाएं। जो फुटबॉलर भारत को 2034 के विश्व कप की चुनौती तक ले जा सकते हैं, उनमें से अधिकतर आज 12 से 20 वर्ष की उम्र के बीच हैं। उनके विकास का समय यही है। शुरुआत जिलास्तरीय स्काउटिंग से हो। फिर ये खिलाड़ी मान्यता प्राप्त अकादमियों और प्रतिस्पर्धी यूथ लीगों से होते हुए पेशेवर क्लबों और राष्ट्रीय टीमों तक पहुंचें। सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को बेहतर कोचिंग, पर्याप्त मैच खेलने के अवसर और मजबूत एशियाई तथा अंतरराष्ट्रीय टीमों के खिलाफ नियमित खेलने का अनुभव मिलना चाहिए। प्रतिभाओं की पहचान कम उम्र में ही होनी चाहिए और उनकी भौगोलिक या आर्थिक पृष्ठभूमि को देखे बिना उन्हें तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। कोचों में भी हमें गंभीरता से निवेश करना होगा। कोच-एजुकेशन को नेशनल कैपेसिटी-बिल्डिंग की तरह लें। नेशनल प्लेयर डेटाबेस, वीडियो एनालिसिस, पारदर्शी स्काउटिंग और सभी प्रतियोगिताओं के लिए समान मानदंड तय करने में तकनीक की मदद ली जा सकती है। तीसरी जरूरत है सभी को साथ लेकर चलने वाला राष्ट्रीय गठबंधन। कोई भी फेडरेशन, मंत्रालय, राज्य सरकार या पेशेवर लीग अपने दम पर विश्वकप क्वालिफिकेशन की क्षमता नहीं रखती। एआईएफएफ को तकनीकी दिशा, नियमन और राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय की जिम्मेदारी उठानी होगी। क्लबों को पेशेवर खिलाड़ियों के विकास का प्रमुख जरिया बनना होगा। केंद्र और राज्य सरकारों को इंफ्रास्ट्रक्चर, स्कूली प्रतियोगिताओं, खेल के मैदानों तक आमजन की पहुंच और उच्चस्तरीय प्रदर्शन के लिए जरूरी सहायता देनी होगी। भारतीय कॉर्पोरेट जगत को भी अब छोटी-छोटी स्पॉन्सरशिप से आगे बढ़कर अकादमियों, कोचों, यूथ लीगों, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर में धैर्य के साथ दीर्घकालिक निवेश करना चाहिए। पूर्व खिलाड़ियों और कोचों को भी सार्थक तकनीकी भूमिकाएं दी जानी जरूरी है। खेल प्रशंसक के तौर पर बड़े हुए बहुत-से भारतीयों की तरह मैं भी डुरंड कप को केवल एक और फुटबॉल प्रतियोगिता के तौर पर नहीं याद करता। यह टूर्नामेंट भारतीय फुटबॉल के इतिहास, संस्थागत टीमों की ताकत और सार्थक प्रतियोगिताओं से उपजे गौरव का प्रतिनिधित्व करता रहा है। आज भी ऐसी प्रतियोगिताएं एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभा सकती हैं। वे भारतीय प्रतिभाओं की पहचान करने और उन्हें आगे बढ़ाने का मंच भी बन सकती हैं। जो फुटबॉलर भारत को 2034 के विश्व कप की चुनौती तक ले जा सकते हैं, उनमें से अधिकतर आज 12 से 20 वर्ष की उम्र के बीच हैं। उनके विकास का समय यही है। इसके लिए हमें एक एकीकृत व्यवस्था की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Exit mobile version